शांता कुमार के बयान पर भड़का शोषण मुक्ति मंच, कहा- आरक्षण नहीं, जातिगत वर्चस्व ने देश को पीछे धकेला

मंच के राज्य संयोजक आशीष कुमार ने कहा है कि यह कहना कि “आरक्षण और जातिवाद देश को पीछे ले जा रहे हैं”, इतिहास, संविधान और सामाजिक यथार्थ को उल्टा पढ़ने जैसा है। उन्होंने कहा कि देश को पीछे जातिवाद नहीं, बल्कि जातिगत वर्चस्व, छुआछूत, बहिष्कार और सदियों तक चले सामाजिक दमन ने धकेला है

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नाहन : पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के आरक्षण और जातिवाद को लेकर दिए गए बयान पर शोषण मुक्ति मंच ने कड़ा एतराज जताया है। मंच के राज्य संयोजक आशीष कुमार ने कहा है कि यह कहना कि “आरक्षण और जातिवाद देश को पीछे ले जा रहे हैं”, इतिहास, संविधान और सामाजिक यथार्थ को उल्टा पढ़ने जैसा है। उन्होंने कहा कि देश को पीछे जातिवाद नहीं, बल्कि जातिगत वर्चस्व, छुआछूत, बहिष्कार और सदियों तक चले सामाजिक दमन ने धकेला है, जिसके खिलाफ आरक्षण एक संवैधानिक और लोकतांत्रिक उपाय है।

यहां जारी बयान में उन्होंने कहा कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन योजना नहीं है, बल्कि जाति के आधार पर होने वाले अपमान, भेदभाव और हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा कवच है। आशीष ने तर्क दिया कि यदि आर्थिक संपन्नता से जातिवाद समाप्त हो जाता, तो देश के मुख्य न्यायाधीश पर सार्वजनिक रूप से जूता फेंकने जैसी घटना सामने नहीं आती। उन्होंने कहा कि यह घटना स्वयं इस धारणा को खारिज करती है कि पैसा, पद या शिक्षा जातिगत घृणा को समाप्त कर सकते हैं और जाति आज भी भारतीय समाज की कठोर सच्चाई बनी हुई है।

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मंच ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि दलितों के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है और प्रतिदिन बड़ी संख्या में दलित जातिगत हिंसा और उत्पीड़न का शिकार बनते हैं। इसके साथ ही शिक्षा, प्रशासन और उच्च संस्थानों में दलितों की भागीदारी को आज भी बेहद सीमित बताया गया है, जबकि ग्रामीण भारत में अधिकांश दलित परिवारों के पास न भूमि है और न ही उत्पादन के साधन।

शोषण मुक्ति मंच ने यह भी आरोप लगाया कि शांता कुमार आर्थिक विषमता की बात तो करते हैं, लेकिन यह बताने से बचते हैं कि इस विषमता में सबसे पीछे दलित समाज खड़ा है। मंच के अनुसार सदियों तक दबाए जाने और संसाधनों से वंचित किए जाने के कारण दलित समाज आज भी सामाजिक-आर्थिक पायदान के सबसे निचले स्तर पर है और आरक्षण से यदि उसकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ है, तो वही सुधार कुछ शक्तियों को असहज कर रहा है।

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मंच ने लिंबड़ा में दलित भेदभाव की घटना, जिंदान हत्याकांड, सूरज हत्याकांड और बिमला देवी हत्याकांड जैसे मामलों पर शांता कुमार की चुप्पी पर भी सवाल उठाए हैं। मंच का कहना है कि यह चुप्पी दर्शाती है कि जब तक दलित अपमान सहता रहे, तब तक सब कुछ सामान्य माना जाता है, लेकिन जैसे ही वह अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है, सामाजिक माहौल खराब होने का आरोप लगाया जाता है।

शोषण मुक्ति मंच ने दो टूक कहा कि आरक्षण पर हमला सामाजिक न्याय और संविधान पर हमला है और जब तक जाति आधारित भेदभाव, हिंसा और अपमान मौजूद है, तब तक आरक्षण समाप्त करने की कोई भी मांग लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ है।

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