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सिरमौरी लोकगीतों के संरक्षण में जुटे राजेश धाल्टा, मंच पर गूंजती सुरीली आवाज बनी पहचान

राजेश धाल्टा आकाशवाणी और दूरदर्शन शिमला से अनुमोदित कलाकार हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, जिला और ग्रामीण स्तर के मेलों में अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। कम आयु में ही उन्हें देश के विभिन्न राज्यों में सिरमौर की संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करने का अवसर मिला, जिससे जिले की लोक संस्कृति को व्यापक पहचान मिली।

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राजगढ़ : सिरमौर जिला की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक लोकगीतों के संरक्षण के लिए समर्पित कलाकार राजेश धाल्टा आज क्षेत्र के प्रमुख लोकगायकों में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। जब भी राजेश की मधुर और सुरीली आवाज किसी सांस्कृतिक मंच पर गूंजती है, तो श्रोता बार-बार ‘वनसमोर’ की फरमाइश करते नजर आते हैं। बीते करीब पांच वर्षों से राजेश सिरमौर के पारंपरिक लोकगीतों की खोज और संकलन में जुटे हुए हैं, ताकि लोकसंगीत के माध्यम से सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण और संवर्धन किया जा सके।

राजेश धाल्टा आकाशवाणी और दूरदर्शन शिमला से अनुमोदित कलाकार हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, जिला और ग्रामीण स्तर के मेलों में अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। कम आयु में ही उन्हें देश के विभिन्न राज्यों में सिरमौर की संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करने का अवसर मिला, जिससे जिले की लोक संस्कृति को व्यापक पहचान मिली।

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क्लासिकल गायन के साथ-साथ गजल और भजन में भी राजेश को विशेष महारत हासिल है। मूल रूप से राजगढ़ से सटे कन्हैच गांव के निवासी राजेश को संगीत की शिक्षा परिवार से विरासत में मिली। उनके पिता सोहन लाल धाल्टा उच्च कोटि के बांसुरी और शहनाई वादक हैं, जबकि चाचा विद्यादत्त धाल्टा ऑलराउंड कलाकार के रूप में जाने जाते हैं।

राजेश की प्रारंभिक शिक्षा मडियाघाट स्कूल में हुई। बचपन से ही संगीत के प्रति गहरी रुचि रखने वाले राजेश ने स्कूली स्तर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेकर लगातार प्रथम स्थान प्राप्त किया। इन्हीं उपलब्धियों के चलते उनके घर में पुरस्कारों का संग्रह है। उन्होंने राजगढ़ महाविद्यालय से स्नातक डिग्री प्राप्त की, जहां प्रो. डॉ. सविता सहगल के सानिध्य में संगीत की शिक्षा ली। इसके बाद हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की।

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राजेश का सपना संगीत विषय में प्रोफेसर बनना है और इसके लिए वे निरंतर मेहनत कर रहे हैं। साथ ही संगीत में पीएचडी करना भी उनका प्रमुख लक्ष्य है। वे अक्सर अपने पिता सोहन लाल और चाचा विद्यादत्त धाल्टा के साथ युगलबंदी में मंच साझा करते हैं। गायन के साथ-साथ राजेश हरमोनियम, ढोलक, तबला और गिटार जैसे वाद्ययंत्र बजाने में भी दक्ष हैं।

सोहन लाल धाल्टा द्वारा स्थापित धाल्टा कला मंच के अंतर्गत एक सांस्कृतिक दल और पहाड़ी बैंड भी संचालित किया जा रहा है, जिसमें अधिकांश कलाकार परिवार से ही जुड़े हैं। इस पहाड़ी बैंड की मांग पूरे सिरमौर के अलावा सोलन और शिमला जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बनी हुई है। पारंपरिक संगीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयासों के चलते राजेश धाल्टा आज सिरमौरी लोकसंस्कृति के एक महत्वपूर्ण संवाहक के रूप में उभर रहे हैं।

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