मध्यप्रदेश की धरती पर गूंजा गिरिपार का लोक रंग, मड़ई उत्सव में छाया हाटी संस्कृति का जादू

जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को समर्पित इस मड़ई उत्सव का आयोजन मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय के सौजन्य और जिला प्रशासन मंडला के सहयोग से किया गया। तीन दिवसीय उत्सव का शुभारंभ 9 जनवरी को हुआ

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राजगढ़ : मध्यप्रदेश के मंडला जनपद के बिछीया में आयोजित तीन दिवसीय जनजातीय मड़ई उत्सव में हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जनपद के गिरिपार क्षेत्र की हाटी संस्कृति ने अपनी विशेष पहचान दर्ज कराई। इस राष्ट्रीय स्तर के नृत्योत्सव में आसरा संस्था के लोक कलाकारों द्वारा प्रस्तुत सिंहटू नृत्य और डगैली नाच दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने और गिरिपार की समृद्ध लोक परंपराओं से देशभर के लोगों को रूबरू कराया।

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आसरा संस्था के प्रभारी एवं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार डॉ. जोगेंद्र हाब्बी ने बताया कि गिरिपार के हाटी जनजातीय क्षेत्र के लोक कलाकार इन दिनों मध्यप्रदेश के मंडला जनपद के बिछीया में तीन दिवसीय मड़ई उत्सव में भाग ले रहे हैं। इस दौरान कलाकारों ने सिंहटू नृत्य और डगैली नाच की प्रभावशाली प्रस्तुतियां दीं, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा।

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जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को समर्पित इस मड़ई उत्सव का आयोजन मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय के सौजन्य और जिला प्रशासन मंडला के सहयोग से किया गया। तीन दिवसीय उत्सव का शुभारंभ 9 जनवरी को हुआ, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय कलाकारों ने अपनी लोक नृत्य शैलियों का प्रदर्शन किया।

राष्ट्रीय स्तर के इस नृत्योत्सव में वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर एवं अंतरराष्ट्रीय कलाकार डॉ. जोगेंद्र हाब्बी के नेतृत्व में प्रस्तुत किए गए गिरिपार क्षेत्र के सिंहटू नृत्य और डगैली नाच को विशेष सराहना मिली। पद्मश्री विद्यानंद सरैक और डॉ. जोगेंद्र हाब्बी के निर्देशन में तैयार इन प्रस्तुतियों को लोक कलाकारों ने मंच पर अत्यंत सजीव और प्रभावशाली अंदाज में प्रस्तुत किया, जिससे बिछीया में मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों से आए दर्शकों में गिरिपार हाटी क्षेत्र की संस्कृति के प्रति गहरी रुचि और जिज्ञासा पैदा हुई।

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डगैली नाच का आयोजन परंपरागत रूप से कृष्ण जन्माष्टमी के बाद आने वाली त्रयोदशी और चतुर्दशी की रात्रियों में किया जाता है, जबकि सिंहटू नृत्य सिरमौर जनपद के गिरिपार क्षेत्र के लेऊनाना और कुप्फर मटलोड़ी गांवों में दीपावली एवं एकादशी के अवसर पर किया जाता है। इन दोनों नृत्यों में प्रयुक्त विशिष्ट मुखौटे और पारंपरिक परिधान दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं।

सिंहटू और डगैली नाच में इस्तेमाल किए गए मुखौटे और परिधान उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार से सम्मानित युवा कलाकार गोपाल हाब्बी ने आसरा संस्था के कलाकारों के सहयोग से तैयार किए हैं, जो इन नृत्य प्रस्तुतियों की विशिष्ट पहचान बनते हैं।

मड़ई उत्सव में गिरिपार के लोक नृत्यों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ का गेड़ी कसाकर, झारखंड का डोमकछ, ओडिशा का गुड़का, मध्यप्रदेश के ढाढ़या, कर्मा और भदौरिया, असम का हमजा तथा तेलंगाना के माथूरी और बाघ नृत्य भी प्रस्तुत किए गए। इन सभी प्रस्तुतियों के बीच गिरिपार के सिंहटू नृत्य और डगैली नाच उत्सव के मुख्य आकर्षण बने रहे।

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तीन दिवसीय इस मड़ई उत्सव में सिरमौर के कलाकारों में लोक गायक रामलाल वर्मा, गोपाल हाब्बी और बिमला चौहान, शहनाई एवं बांसुरी वादक बलदेव, ढोलक वादक संदीप, करनाल एवं रणसिंगा वादक रविदत्त और लोक नर्तकों में चमन, मनमोहन, अमीचंद, सुनील, सरोज, अनु, आरती और प्रिया सहित कई कलाकार शामिल रहे।