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रेणुका बांध विस्थापितों का डांडा अंबोया की जमीन पर ऐतराज, डिमार्केशन बीच में ही छोड़ लौटे, बोले- नहीं चाहिए बंजर जमीन

विस्थापितों का आरोप है कि कागजों में उन्हें यह जमीन ‘कलाऊ’ बताई गई थी, लेकिन मौके पर पानी की एक बूंद तक नहीं है और सड़क की भी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।

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नाहन : राष्ट्रीय महत्व की श्री रेणुकाजी बांध परियोजना के विस्थापितों के पुनर्वास के लिए चयनित जमीन को लेकर मंगलवार को डांडा अंबोया में विवाद खड़ा हो गया। इस दौरान राजस्व विभाग द्वारा की गई जमीन की निशानदेही को रेणुका बांध विस्थापित संघर्ष समिति ने पूरी तरह से नकार दिया और नाराजगी जताते हुए विस्थापित लोग डिमार्केशन के दौरान ही मौके से लौट गए।

दरअसल, बांध प्रबंधन और जिला प्रशासन की ओर से विस्थापितों के लिए चार स्थानों में से डांडा अंबोया में चिन्हित की गई जमीन की डिमार्केशन को लेकर राजस्व विभाग की टीम मौके पर पहुंची थी। इस दौरान मौके रेणुका बांध विस्थापित संघर्ष समिति के पदाधिकारी भी मौजूद रहे। निशानदेही के दौरान विस्थापितों ने इस जमीन पर कड़ा विरोध जताया।

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समिति के फाउंडर मेंबर विनोद ठाकुर, प्रेस सचिव योगी ठाकुर, मुख्य सलाहकार विपिन ठाकुर, निरंजन, सतपाल तोमर, हरिचंद, सोमदत्त शर्मा, अमित, प्रताप सिंह तोमर, योगेंद्र कपिल, बालमोहन, सुरेंद्र और मदन ने कहा कि डांडा अंबोया में दिखाई गई करीब 248 बीघा जमीन पूरी तरह से बंजर है, जहां खेती करना संभव नहीं है। योगी ठाकुर ने कहा कि कागजों में उन्हें यह जमीन ‘कलाऊ’ बताई गई थी, लेकिन मौके पर पानी की एक बूंद तक नहीं है और सड़क की भी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।

विस्थापितों का आरोप है कि डिमार्केशन के दौरान जो जमीन उन्हें दिखाई गई, वह पहले बताई गई जमीन से मेल नहीं खाती। उन्होंने यह भी कहा कि जिस जमीन की पेशकश की जा रही है, उसके बीच में स्थानीय लोगों की निजी जमीन भी पड़ती है, जिस पर स्थानीय लोगों ने भी मौके पर अपनी नाराजगी जताई।

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समिति के सदस्यों ने कहा कि इन परिस्थितियों में विस्थापितों ने डिमार्केशन के दौरान ही अपना विरोध दर्ज कराते हुए मौके से लौटने का फैसला किया और एचपीपीसीएल की ओर से दिखाई गई जमीन को पूरी तरह से नकार दिया।