होमAgricultureखेतीबाड़ी: अक्तूबर के दूसरे पखवाड़े में किसान और पशुपालक करें ये जरूरी...

खेतीबाड़ी: अक्तूबर के दूसरे पखवाड़े में किसान और पशुपालक करें ये जरूरी काम, कृषि वैज्ञानिकों ने जारी की खास गाइडलाइन

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने किसानों और पशुपालकों को सलाह दी है कि वे अपने क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि एवं पशुपालन संबंधी कार्य करें।

धौलाकुआं : अक्तूबर महीने का दूसरा पखवाड़ा शुरू हो चुका है। ऐसे में रबी फसलों की बिजाई, सब्जियों की देखभाल और पशुओं के सही रख-रखाव को लेकर वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण एडवाइजरी जारी की है।

दूसरे पखवाड़े में गेहूं, चना, मसर और तिलहनी फसलों की बिजाई के साथ सब्जियों की बुवाई, फसल संरक्षण और पशुधन की देखभाल से जुड़े कई काम जरूरी हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं के प्रभारी एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज मित्तल ने किसानों और पशुपालकों को सलाह दी है कि वे अपने क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि एवं पशुपालन संबंधी कार्य करें। उन्होंने किसानों के लिए जरूरी सुझाव साझा किए हैं।

गेहूं और जौ की बिजाई
– निचले और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं की बिजाई अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के मध्य तक करें।
– गेहूं की एचएस-542 और वीएल-829 तथा जौ की हिम पालम जौ-1, हिम पालम जौ-2 और एचबीएल-113 किस्में लगाई जा सकती हैं।
– गेहूं के लिए प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम बीज रखें।
– बिजाई से पहले गेहूं के बीज को फफूंदानाशक बैविस्टिन 2.5 ग्राम, वीटावैक्स 2.5 ग्राम या रैक्सिल 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।

चना और मसर की बिजाई
– अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में चने की बिजाई की जा सकती है। इसके लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट या रेतीली भूमि उपयुक्त है।
– हिमाचल चना-1, हिमाचल चना-2 और जीपीएफ-2 की बिजाई 30 सेंटीमीटर की कतार दूरी पर करें। एचपीजी-17 के लिए कतारों के बीच 50 सेंटीमीटर दूरी रखें।
– चने का बीज 10 सेंटीमीटर गहराई पर बोएं। कम गहराई पर बिजाई करने से उखेड़ा या विल्ट रोग का खतरा हो सकता है।
– चने के बीज को बैविस्टिन 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
– छोटे दाने वाली चना किस्मों के लिए 40-45 किलोग्राम और बड़े दाने वाली किस्मों के लिए 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर रखें।
– मसर की विपाशा और मारकंडे किस्में लगाएं। बीज की मात्रा 25-35 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखें। देर से बिजाई करने पर बीज की मात्रा 20-25 प्रतिशत बढ़ा दें।
– मसर की बिजाई 20-25 सेंटीमीटर की कतार दूरी पर करें।

ये भी पढ़ें:  शराब के नशे में धुत्त फायर कर्मी ने मचाया हुड़दंग, शीशे तोड़े, साथी कर्मियों से की गाली गलौच

सरसों और अलसी की बिजाई
– राया की आरसीसी-4 और करण राई, गोभी सरसों की किस्म नीलम, शीतल और ओएनके-1, भूरी सरसों की केबीएस-3 व एचपीबीएस-1 तथा अलसी की हिम पालम अलसी-1 और हिम पालम अलसी-2 किस्में लगाएं।
– अलसी के लिए 40 किलोग्राम तथा राया, गोभी सरसों और भूरी सरसों के लिए 6 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर रखें।
– गोभी सरसों की बिजाई 45 सेंटीमीटर और अन्य तिलहनी फसलों की बिजाई 30 सेंटीमीटर की कतार दूरी पर करें।
– बीज 2-3 सेंटीमीटर गहराई पर डालें।
– बारानी क्षेत्रों में अधिक पैदावार के लिए गोभी सरसों (नीलम) और चने की 1:1 अंतराल वाली मिश्रित खेती अपनाने की सिफारिश की जाती है।
– बिजाई के समय 4-5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर इफको मिश्रित खाद डालें।

निचले पर्वतीय क्षेत्रों में सब्जियों की बिजाई
– मटर की अगेती किस्में पालम त्रिलोकी, अरकल, वीएल-7 और मटर अगेता लगाएं।
– मटर की बिजाई के समय प्रति हेक्टेयर 200 क्विंटल गोबर की खाद, 185 किलोग्राम इफको (12:32:16) मिश्रित खाद, 50 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश और 60 किलोग्राम यूरिया डालें।
– लहसुन की जीएचसी-1, एग्री-फाउंड पार्वती या सोलन सिलेक्शन किस्म लगाएं। कतारों में 15 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 10 सेंटीमीटर दूरी रखें।
– लहसुन की बिजाई से पहले प्रति हेक्टेयर 250 क्विंटल गोबर की खाद, 234 किलोग्राम इफको (12:32:16) मिश्रित खाद, 37.5 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश और 210 किलोग्राम यूरिया डालें।
– पालक, मेथी, धनिया, मूली, गाजर और शलजम की सीधी बिजाई करें।
– चाइनीज बंदगोभी, फूलगोभी, बंदगोभी, गांठगोभी और ब्रोकली की तैयार पौध की उचित दूरी पर रोपाई करें।

ये भी पढ़ें:  प्रदेश के इन 5 शिक्षकों ने मध्य प्रदेश के दमोह में राष्ट्रीय कार्यशाला में दी लोक संस्कृति की प्रस्तुति

मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में सब्जियों की रोपाई
– फूलगोभी, बंदगोभी, गांठगोभी, चाइनीज बंदगोभी और ब्रोकली की तैयार पौध रोपें।
– रोपाई के समय प्रति हेक्टेयर 250 क्विंटल गोबर की खाद, 235 किलोग्राम इफको (12:32:16) मिश्रित खाद, 54 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश और 100 किलोग्राम यूरिया डालें।
– मूली की पूसा हिमानी, मीनो अर्ली और ऑल सीजन; शलजम की पीटीडब्ल्यूजी; पालक की पूसा हरित, पूसा भारती और आल ग्रीन; मेथी की पालम सौम्य, पूसा कसूरी और आईसी-74 किस्में लगाएं।
– लहसुन की जीएचसी-1 और एग्री-फाउंड पार्वती किस्मों की भी बिजाई करें।
– प्याज की नर्सरी तैयार करने के लिए बीज को बिजाई से पहले कार्बेन्डाजिम (बैविस्टिन) 2-2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
– खेतों में लगी सब्जियों की निराई-गुड़ाई करते रहें। जरूरत के अनुसार पौधों की बढ़वार के लिए 40-50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर डालें।

फसलों को रोग और कीटों से बचाएं
– प्याज, फूलगोभी, बंदगोभी, ब्रोकली, गांठगोभी और अन्य सब्जियों की स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए कृषि विश्वविद्यालय की सलाह के अनुसार नर्सरी की क्यारियों का बिजाई से पहले उपचार करें।
– जिन खेतों में कटुआ कीट की समस्या हो, वहां पौधरोपण के बाद कीटनाशक के इस्तेमाल से पहले कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग से सही दवा, मात्रा और सुरक्षित उपयोग की पुष्टि करें।
– मटर में विल्ट तथा गेहूं की खुली और जौ की बंद कंगियारी से बचाव के लिए बिजाई से पहले बीज उपचार करें। इसके लिए कार्बेन्डाजिम (बैविस्टिन) या वीटावैक्स 2-2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है।

पशुओं की देखभाल
– गौशाला और उसके आसपास सफाई रखें तथा अक्टूबर में कीटों और परजीवियों से बचाव के उचित उपाय करें।
– पशु के खुरों से खून या पस निकलने, लंगड़ाकर चलने, भूख कम होने या तेज बुखार जैसे लक्षण दिखने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
– लम्पी स्किन रोग, गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और तीन दिन वाले बुखार जैसी संक्रामक बीमारियों के प्रति सतर्क रहें।
– ब्याने के 60-90 दिन के भीतर पशु का दोबारा गर्भाधान कराने के लिए गर्माने के लक्षणों पर ध्यान दें।
– नवजात बछड़े को जन्म के 1-2 घंटे के भीतर उसके शरीर के वजन के दसवें हिस्से के बराबर खीस (कोलोस्ट्रम) जरूर पिलाएं।
– पशुओं को ठंड से बचाने के प्रबंध करें और संतुलित आहार के साथ खनिज लवण भी दें।
– घासनियों में उगी स्थानीय घास काटकर अच्छी तरह सुखाएं और सुरक्षित भंडारण करें। हरे चारे से साइलेज बनाकर भी उसे लंबे समय तक संरक्षित किया जा सकता है।

ये भी पढ़ें:  अक्तूबर में खेतों में क्या बोएं, कैसे करें तैयारी? कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों को बताया पूरा फसलवार प्लान

मछली और मुर्गीपालन
– मछली के तालाबों में दिन के शुरुआती घंटों में ताजा पानी डालें या एयरेटर का इस्तेमाल करें, ताकि पानी में ऑक्सीजन का स्तर बना रहे।
– मछलियों की अच्छी वृद्धि के लिए उचित और संतुलित फीड का उपयोग करें।
– मुर्गियों के लिए प्रतिदिन 15-16 घंटे रोशनी की व्यवस्था करें और बिछावन को सूखा रखें।
– मांस उत्पादन के लिए चूजे पालने का यह उपयुक्त समय है। चूजे किसी प्रमाणित हैचरी से ही खरीदें।

डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि किसान और पशुपालक अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें।

कृषि तकनीकी सूचना केंद्र (एटिक) के फोन नंबर 01894-230395 या टोल-फ्री नंबर 1800-180-1551 पर भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

Aapki Baat News Desk
Aapki Baat News Deskhttps://aapkibaatnews.com
आपकी बात न्यूज डेस्क देश, प्रदेश और स्थानीय स्तर की हर महत्वपूर्ण खबर को तेज, विश्वसनीय और तथ्यात्मक तरीके से पाठकों तक पहुंचाने के लिए समर्पित है। राजनीति, समाज, प्रशासन, शिक्षा, अपराध, मनोरंजन और जनसरोकार से जुड़े हर मुद्दे पर सटीक जानकारी और प्रभावशाली प्रस्तुति हमारी प्राथमिकता है, ताकि पाठकों को हर बड़ी अपडेट एक ही मंच पर मिल सके।

Latest Articles

Explore More