हर फरियादी को महासू देवता उचित न्याय देकर करते हैं दोषमुक्त, जानें यहां का इतिहास

मान्यता है कि शिलाई के लाधी क्षेत्र में लगभग 15वीं शताब्दी में मूल मंदिर हनोल से अत्याचारियों को सजा और पीड़ितों को न्याय दिलाने कोटी स्थान पर आए. उत्तराखंड के हनोली में महासू देव अपने चार भाइयों के साथ न्याय के देवता के प्रतीक चतुर्भुज रूप में विराजमान हैं.

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Mahasu Devta Temple Koti

देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कण-कण में देवी-देवता वास करते हैं. यहां का हर एक जिला देवी-देवताओं का इतिहास समेटे हुए हैं. इन्हीं में से एक है जिला सिरमौर का कोटी गांव. जहां महासू देवता हर फरियादी को उचित न्याय देकर दोषमुक्त करते हैं. इस मंदिर का इतिहास करीब 9 शताब्दी पुराना है.

शिलाई विकास खंड कोटी में महासू देवता का दिव्य एवं आलौकिक मंदिर स्थित है. यह स्थान जिला मुख्यालय नाहन से वाया पांवटा साहिब-शिलाई लगभग 130 किलोमीटर दूर है. मान्यता है कि शिलाई के लाधी क्षेत्र में लगभग 15वीं शताब्दी में मूल मंदिर हनोल से अत्याचारियों को सजा और पीड़ितों को न्याय दिलाने इस स्थान पर आए. उत्तराखंड के हनोली में महासू देव अपने चार भाइयों के साथ न्याय के देवता के प्रतीक चतुर्भुज रूप में विराजमान हैं.

यहां से महासू के दो भाई शिलाई के बाली आए. केवल यही स्थान ऐसा है जहां बोठा और चालदा दो भाई एक साथ विराजमान हैं. महासू देवता चार भाइयों के रूप में बोठा, चालदा, वांशिक और पबासी उत्तराखंड के हनोली में स्थित हैं. इस मंदिर में वैसे तो पूरे वर्ष श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, किंतु भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को इस देवता का स्नान होता है. उस दिन कोटी के देवालय में अपार संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच कर देवता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

कहते हैं कि 15वीं सदीं में एक बार शिलाई गांव के ठिंडाऊ से 19 लोग देवता के लिए पगडंडी से पैदल हनोल जा रहे थे, तो पहले पड़ाव के लिए टौंस और भंगाल नदी के संगम पर मिनस पहुंचे. वहां नदी के किनारे रास्त गांव का एक बेजंतरी मछलियों का शिकार कर रहा था. ठिंडाउओं देव यात्रियों ने उससे मछलियां मांगी, परंतु जब उसने मना किया, तो उन्होंने मजाक में उससे मछलियां ले ली. जब वह रोता हुआ घर पहुंचा तो उन देवयात्रियों ने उसे मछलियां वापस देनी चाहीं तो उसने उन ठिंडाऊवों की एक न सुनी. वह गांव के नंबरदार के पास गया और रोते हुए उनकी शिकायत कर दी. Mahasu Devta Temple Koti

रियासत गांव जो वर्तमान में रास्त है, के मुखिया और ग्रामीणों ने मिनस पहुंच कर डांगरे और तलवारों से 19 में से 18 ठिंडु देवयात्रियों की निर्मम हत्या कर दी. उनमें से एक व्यक्ति घर की तरफ भागा उसे दिखना बंद हो गया. जब वह हनोल की तरफ मुड़ा तो उसे दिखना शुरू हो गया. उसने प्रण कर लिया कि हनोल देवालय में जाकर आत्महत्या कर लूंगा. जैसे ही वह हनोल से तीन किलोमीटर दूर शंवालई पहुंचा, तो हनोली मंदिर में देवता प्रकट हुए और उनके साथ हुए अन्याय के बारे बताया.

वहां पहुंचने पर लोगों ने उसे पकड़ लिया. देवता की हवा आई और देवता ने उसके साथ घटित हुए घटनाक्रम की जानकारी दी. महासू देवता ने उस पर चावल का झाड़ा और पानी का छींटा मारा, जिससे उसके सभी घाव ठीक हो गए. देवता ने उसे आश्वासन दिया कि मैं न्याय करूंगा. मैं रियासत को तबाह और शिलाई को खुशहाल बनाऊंगा. देवता ने उसे चार दाने चावल दिए और जब वह चावल लेकर कोटी पहुंचा, तो उसने आपबीती सुनाई और गांव के राम्टा मुखिया को वह चावल दिए.

राम्टा मुखिया ने अहंकार से उन चार दानें चावल को साथ बहते गंदे नाले में डालने को कहा. ठिंडाऊ ने देवता से मन ही मन क्षमा मांगी और डर के मारे उन चावलों को गंदे नाले में डाल दिया. राम्टा को देवदोष हो गया और गांव में आधि-व्याधि पैदा हो गई. राम्टा मुखिया हनोल देवालय पहुंचा और देव स्तुति की. देवता ने उसे बताया कि जहां मेरे चावल फैंके हुए हैं, वह जगह मुझे पसंद है. तेरे आठ घरों के दरवाजे एक सांगल से बंद होते हैं. वह सारा बेहडा छोड़ दो. मैं वहां पर विराजमान हूंगा. तभी से वहां दो देवालय बनाए गए हैं और एक में बोठा महासू और दूसरे में चालदा महासू हैं. महासू देवता ने उसे अपना उपासक बनाया. देवता ने 15वीं सदी में अपने मंदिर बनवाए और देव कार्यकारिणी का विस्तार किया.

इस कार्यकारिणी में बजीर, पुजारी, देयाल, ढडवारी, ठाणी, धानी, पलग्यारे, नगारची, बजंतरी, नटारी सहित देवकरींदों का चयन किया गया. शिलाई गांव में ठिंडाऊ आज लगभग चार सौ परिवार हैं, जबकि रास्त गांव आज भी देवशाप के कारण 25-30 परिवार ही हैं. आज भी चालदा महासू देवता के मंदिर में पालकी में 18 ठिंडाऊवों की चांदी के पितर विराजमान हैं, जिनकी देवता निरंतर चारों पहर अपने साथ पूजा करवाते हैं.

कोटी महासू देवालय जीर्णोद्धार समिति के महासचिव उदय भारद्वाज बताते हैं कि महासू देवता की पूजा रमलसार विधि द्वारा गाय के शुद्ध देशी घी और गुग्गुल से की जाती है. यह पूजा प्रति दिन सुबह और शाम को दिन ढलने के बाद रात को संधोल होती है, जिसमें ढोल, नगाड़े, रणसिंघा, दमाऊ, वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं. यदि देवता किसी के घर जाते हैं, तो उस दिन और रात्रि की पूजा उस श्रद्धालु के नाम से की जाती है. पूजा में छामबुर, पाजा, बेल, दूर्वा, ओंगा, कथूर सहित नौ में से एक पत्ते चढाए जाते हैं. Mahasu Devta Temple Koti

इसके साथ देवता को जो जिंदाऊल/चावल चढ़ाए जाते हैं, उन्हें चार बार धोया जाता है और घी में भीगोकर देवता को अर्पित किया जाता है. इसे देवभोग कहा जाता है. देवता को गाय के शुद्ध देशी घी का धूप दिया जाता है. अंत में देवपरिधि के अंदर आने वाले सभी देवता के बजीर, वीर, कईलु, शेलकुडिया, काली माता, बजरंग बली इत्यादि सभी देवताओं को धूप दिया जाता है. इस विधान और पूजा अर्चना में लगभग एक-डेढ़ घंटे तक सभी वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं. इस दौरान वहां मौजूद श्रद्धालुओं को प्रसाद, मस्तक में तिलक और पात्री को कान में लगाया जाता है.

 

लेखक : सुभाष चंद्र शर्मा

इस मंदिर में देवता द्वारा प्रसिद्ध एवं प्राचीन न्याय प्रणाली के माध्यम से सटीक न्याय किया जाता है. न्यायिक विधि भी कई प्रकार की है, जिसमें भारव डालना, जिंगार करना निमघडना शामिल हैं. यहां आने वाले हर फरयादी को देवता उचित न्याय देकर दोषमुक्त करते हैं. उदय भारद्वाज बताते हैं कि छत्रपति सम्राट कहे जाने वाले चालदा महासू का एकछत्र राज होने से इसे छत्रधारी कहा जाता है. यह देवता चलायमान हैं. इसके चलते या देवालय से बाहर निकलते हुए इनके सम्मान में देयालिण, नटारी नाम की गोपियां नृत्य करती है और श्रद्धालु इनके सम्मान में श्रद्धानुसार धन भेंट करते हैं.

लेखक सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से अधीक्षक पद से सेवानिवृत्त हैं। वह नाहन तहसील के गांव खदरी (विक्रमबाग) के निवासी हैं।