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जब शिरगुल तालाब में नाव पर विराजमान होते हैं भगवान वामन, जानिए पच्छाद क्षेत्र के सबसे बड़े धार्मिक व सांस्कृतिक उत्सव का इतिहास

सराहां में भगवान वामन की पूजा और देव परंपराओं का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन मेले के इतिहास में वर्ष 1928 का विशेष महत्व है।

सिरमौर के पच्छाद क्षेत्र का सराहां कस्बा हर वर्ष वामन द्वादशी मेले के दौरान आस्था, लोक संस्कृति और परंपराओं के रंग में रंग जाता है। तीन दिन तक चलने वाला राज्य स्तरीय वामन द्वादशी मेला भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान वामन को समर्पित है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोक वाद्ययंत्रों की गूंज, पारंपरिक शोभायात्रा, नौका विहार, खेलकूद और व्यापारिक गतिविधियां इस मेले को खास बनाती हैं। पच्छाद और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन का हिस्सा बनने सराहां पहुंचते हैं।

1928 में मिला मेले को व्यवस्थित स्वरूप
सराहां में भगवान वामन की पूजा और देव परंपराओं का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन मेले के इतिहास में वर्ष 1928 का विशेष महत्व है। तत्कालीन सिरमौर रियासत के शासनकाल में स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों के सामूहिक प्रयासों से मेले को व्यवस्थित और बड़े स्वरूप में आयोजित करने की शुरुआत हुई।

इसके बाद मेले का दायरा लगातार बढ़ता गया। धार्मिक आयोजन के साथ दूर-दराज से व्यापारी यहां पहुंचने लगे। स्थानीय हस्तशिल्प, कृषि उत्पादों की प्रदर्शनियां और खेलकूद प्रतियोगिताएं भी मेले का हिस्सा बनीं। धीरे-धीरे यह आयोजन पच्छाद क्षेत्र के प्रमुख वार्षिक मिलन और व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचान बनाने लगा। आज इस मेले में करोड़ों रुपये का कारोबार होता है। पच्छाद के लोग मेले में खूब खरीदारी करते हैं।

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शिरगुल तालाब तक निकलती है भगवान वामन की पालकी
वामन द्वादशी मेले का सबसे खास आकर्षण भगवान वामन की पारंपरिक पालकी शोभायात्रा और नौका विहार है। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन के बीच भगवान वामन की पालकी को नगर के बीच स्थित ऐतिहासिक शिरगुल तालाब तक ले जाया जाता है।

तालाब पहुंचने के बाद पालकी को सजी हुई नाव में विराजमान किया जाता है और पारंपरिक नौका विहार की रस्म निभाई जाती है। इस परंपरा को देखने के लिए तालाब के चारों ओर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। आसपास के गांवों से भी लोग भगवान वामन के दर्शन और इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बनने सराहां पहुंचते हैं।

राजा बलि और भगवान वामन से जुड़ी है पौराणिक कथा
वामन द्वादशी का संबंध भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथा से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार असुर राजा बलि अत्यंत शक्तिशाली और दानवीर शासक थे। उन्होंने अपने पराक्रम और तपोबल से स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था।

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देवताओं को उनका अधिकार वापस दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन यानी बौने ब्राह्मण का रूप धारण किया। भगवान वामन राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंचे और उनसे दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली।

संकल्प पूरा होते ही भगवान वामन ने विराट रूप धारण किया। पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग को नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में रख दिया। उनकी वचनबद्धता और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बनने का वरदान दिया। इसी पौराणिक प्रसंग की स्मृति में वामन द्वादशी मनाई जाती है।

सराहां में भगवान वामन की विशेष पूजा
सराहां के ऐतिहासिक मंदिर में भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों के साथ भगवान वामन की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसी धार्मिक परंपरा और वामन अवतार से जुड़े विश्वासों के कारण यहां वामन द्वादशी का आयोजन विशेष श्रद्धा के साथ होता है।

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मेले की पहचान केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यहां सिरमौर की लोक संस्कृति, पारंपरिक वाद्ययंत्र, देव परंपराएं और ऐतिहासिक धरोहर एक साथ दिखाई देती हैं। यही वजह है कि वामन द्वादशी मेला सराहां की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है।

स्थानीय मेले से राज्य स्तरीय आयोजन तक का सफर
वामन द्वादशी मेले की शुरुआत स्थानीय स्तर के आयोजन के रूप में हुई थी। समय के साथ इसका विस्तार हुआ और यह ब्लॉक स्तर से जिला स्तरीय मेले तक पहुंचा। आज धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के चलते इसे राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्राप्त है।

सदियों पुरानी देव परंपराओं और वर्ष 1928 से व्यवस्थित रूप में आगे बढ़ती आ रही इस परंपरा ने सराहां के वामन द्वादशी मेले को ऐसा आयोजन बना दिया है, जहां हर वर्ष आस्था के साथ इतिहास और लोक संस्कृति भी जीवंत होती नजर आती है।

Aapki Baat News Desk
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