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नाहन नगर परिषद चुनाव में इस बार भाजपा की बड़ी परीक्षा, क्या नए चेहरे लगवा पाएंगे जीत की हैट्रिक!

नगर परिषद चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो गया है। नाहन नगर परिषद चुनाव इस बार केवल प्रत्याशियों की जीत-हार का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि पिछले 10 वर्षों की नगर परिषद की परफॉर्मेंस भी जनता के बीच बड़ा मुद्दा बन गई है।

नाहन : नगर परिषद चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो गया है। नाहन नगर परिषद चुनाव इस बार केवल प्रत्याशियों की जीत-हार का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि पिछले 10 वर्षों की नगर परिषद की परफॉर्मेंस भी जनता के बीच बड़ा मुद्दा बन गई है।

जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, शहर के अलग-अलग वार्डों में सड़कों, सीवरेज, स्ट्रीट लाइटें, पार्किंग जैसी अन्य मूलभूत सुविधाओं के साथ साथ आवारा पशुओं, उत्पाती बंदरों को लेकर लोगों की नाराजगी खुलकर सामने आ रही है, जिससे पिछले एक दशक से नगर परिषद की सत्ता पर काबिज रही भाजपा के लिए इस बार राह इतनी आसान नहीं दिख रही।

इस बार भाजपा ने डैमेज कंट्रोल करते हुए पूर्व में जीतकर आए चेहरों की जगह नए चेहरों को चुनावी अखाड़े में उतारा है। वहीं, विपक्षी दल के प्रत्याशी निशाना साधते हुए नगर परिषद की नाकामियों और विकास में अनदेखी को मुद्दा बनाकर जनता के बीच पहुंचे हैं।

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भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डा. राजीव बिंदल के सामने समर्थित प्रत्याशियों की जीत बड़ी प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है। डा. राजीव बिंदल ने चुनावी प्रचार में अपने प्रत्याशियों के समर्थन में पूरी ताकत झोंकी है। उधर, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जीत की राह इतनी आसान नहीं है, चूंकि कहीं न कहीं एंटी इनकंबेंसी भी इस बार हावी होती नजर आ रही है।

बड़ी बात ये भी है कि नाहन नगर परिषद तब भाजपा शासित हुई, जब डा. राजीव बिंदल खुद विधायक थे। अकसर ये भी देखा गया है कि नगर निकाय और पंचायती राज चुनावों में प्रदेश की सत्ता पर काबिज वर्तमान राजनीतिक दल की सरकार का प्रभाव जरूर रहता है।

इस बार की चुनावी बेला में वार्ड नंबर-1 को लेकर खासी चर्चा हो रही है। यहां भाजपा की पूर्व पार्षद, जो नगर परिषद अध्यक्ष भी रह चुकी हैं, वे इस बार चुनाव मैदान में नहीं उतरीं। पार्टी को इस वार्ड में स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरा तक नहीं मिल पाया और दूसरे वार्ड से प्रत्याशी को मैदान में उतारना पड़ा।

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यही नहीं वार्ड-2 में भी विजेता पार्षद की जगह भाजपा ने नए चेहरे को प्रत्याशी बनाया है। इसके अलावा वार्ड नंबर-7 में भी भाजपा को कोई स्थानीय चेहरा नहीं मिला। इस वार्ड में अन्य वार्ड के युवा को अपना प्रत्याशी बनाया गया है। यही स्थिति अन्य कई वार्डों में भी नजर आई है। जानकारों का मानना है कि जीते हुए चेहरों की जगह नए चेहरों पर दांव खेलना भाजपा की मजबूरी बन गया था।

राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी मानना है कि नगर परिषद शहर की आय बढ़ाने और संसाधनों के बेहतर उपयोग में भी कोई प्रभावी मॉडल विकसित नहीं कर सकी। आर्थिक रूप से मजबूत संभावनाएं होने के बावजूद नाहन को आधुनिक और व्यवस्थित शहर के रूप में विकसित करने की दिशा में परिषद की भूमिका अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई।

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चुनावी माहौल में अब भाजपा समर्थित प्रत्याशियों को अपने पुराने पार्षदों के कामकाज का जवाब जनता के बीच देना पड़ रहा है। राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो नाहन नगर परिषद चुनाव अब केवल उम्मीदवारों का मुकाबला नहीं, बल्कि पिछले 10 वर्षों की नगर परिषद की कार्यशैली पर मुहर लगाने या नहीं लगाने के रूप में देखा जा रहा है।

अब ये देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डा. बिंदल अपनी घरेलू नगर परिषद की सत्ता पर नए चेहरों के सहारे जीत की हैट्रिक लगा पाएंगे या नहीं, ये तो चुनावी नतीजे सामने आने के बाद ही साफ हो पाएगा।

Aapki Baat News Desk
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