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किसानों के लिए काम की बात: जुलाई के दूसरे पखवाड़े में क्या करें? कृषि विश्वविद्यालय ने फसलवार जारी किया पूरा प्लान

चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के प्रसार शिक्षा निदेशालय ने जुलाई 2026 के दूसरे पखवाड़े के लिए किसानों एवं पशुपालकों के हित में कृषि एवं पशुपालन संबंधी विस्तृत एडवाइजरी जारी की है।

धौलाकुआं (सिरमौर) : चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के प्रसार शिक्षा निदेशालय ने जुलाई 2026 के दूसरे पखवाड़े के लिए किसानों एवं पशुपालकों के हित में कृषि एवं पशुपालन संबंधी विस्तृत एडवाइजरी जारी की है।

कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं सिरमौर के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रभारी डॉ. पंकज मित्तल ने बताया कि विश्वविद्यालय ने मौसम के पूर्वानुमान को ध्यान में रखते हुए धान, मक्की, दलहनी एवं तिलहनी फसलों, सब्जी उत्पादन, फसल संरक्षण, गृह विज्ञान, पशुधन, मुर्गीपालन तथा मत्स्य पालन से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक सलाह अपनाकर किसान उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ बारिश के मौसम में होने वाले नुकसान से भी बच सकते हैं।

एडवाइजरी के अनुसार, जिन किसानों ने जुलाई के पहले सप्ताह में धान की रोपाई की है, वे रोपाई के बाद जहां पौधे खराब हो गए हैं, वहां नए पौधे लगाएं। धान में खरपतवार नियंत्रण के लिए रोपाई के 4 दिन बाद सेफनर के साथ प्रीटिलाक्लोर, 7 दिन बाद बिना सेफनर प्रीटिलाक्लोर अथवा 4 से 5 दिन के भीतर व्यूटाक्लोर (मैचटी) का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। वहीं रोपाई के 25 से 30 दिन बाद बाइस्पाईरीबैक 10 ईसी के छिड़काव से खरपतवार नियंत्रण करने को कहा गया है।

मक्की उत्पादकों को सलाह दी गई है कि 30 से 35 दिन की फसल में निराई-गुड़ाई के साथ 65 से 85 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर डालें। साथ ही सभी प्रकार के खरपतवारों के नियंत्रण के लिए बुवाई के 20 दिन बाद टेम्बोट्रियोन का सर्फेक्टेंट के साथ छिड़काव करें।

दलहनी फसलों के तहत माश, मूंग, कुल्थी और सोयाबीन की खेती करने वाले किसानों को खेतों में जल निकासी की उचित व्यवस्था बनाए रखने और समय पर खरपतवार नियंत्रण करने की सलाह दी गई है। सोयाबीन की फसल में बुवाई के 25 से 30 दिन बाद, जब खरपतवारों में 2-3 पत्तियां निकल आएं, तब अनुशंसित खरपतवारनाशी का प्रयोग करने को कहा गया है।

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तिलहनी फसलों में सूरजमुखी की बुवाई 10 से 12 किलोग्राम तथा तिल की बुवाई 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से कतारों में करने की सलाह दी गई है। बुवाई से पहले बीज को कैप्टान फफूंदनाशक से उपचारित करने की भी सिफारिश की गई है।

सब्जी उत्पादकों को बरसात के मौसम में अगेती फूलगोभी की किस्मों पालम उपहार, इम्प्रूव्ड जैपनीज, पूसा दीपाली तथा संकर किस्मों मेघा और बरखा की पौध 45 सेंटीमीटर की दूरी पर शाम के समय मेड़ों पर लगाने की सलाह दी गई है। टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च, हरी मिर्च तथा कद्दू वर्गीय सब्जियों में निराई-गुड़ाई के दौरान पौधों की जड़ों के पास 50 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर देने की सिफारिश की गई है। ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में मटर की पालम समूल, पंजाब-89, लिंकन, आजाद मटर-1 तथा पालम प्रिया किस्मों की बुवाई करने तथा खेत की तैयारी के दौरान गोबर की खाद, मिश्रित उर्वरक और म्यूरेट ऑफ पोटाश डालने की सलाह दी गई है। साथ ही बुवाई के तुरंत बाद खरपतवारनाशी का छिड़काव करने को कहा गया है।

फसल संरक्षण के तहत विश्वविद्यालय ने बैंगन, टमाटर और भिंडी में फल छेदक सुंडी, भिंडी में ब्लिस्टर बीटल, बैंगन और करेले में हड्डा बीटल तथा टमाटर एवं कद्दूवर्गीय सब्जियों में फल मक्खी के नियंत्रण के लिए अनुशंसित कीटनाशकों के प्रयोग की सलाह दी है। फल मक्खी से बचाव के लिए गिरे हुए फलों को नष्ट करने, गुड़ और मैलाथियॉन के मिश्रण का छिड़काव करने तथा प्रति कनाल एक फेरोमोन ट्रैप लगाने की सिफारिश की गई है। बैंगन और टमाटर में फल सड़न की रोकथाम के लिए रिडोमिल एमजेड अथवा मेटको के छिड़काव की सलाह भी दी गई है।

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गृह विज्ञान विशेषज्ञों ने मानसून के दौरान खान-पान में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि बारिश के मौसम में नमी बढ़ने से पानी से फैलने वाले संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में लौकी, करेला, टिंडा, भिंडी, अदरक और हल्दी जैसी आसानी से पचने वाली सब्जियों का सेवन करें। फल और सब्जियां अच्छी तरह धोकर ही उपयोग करें तथा पहले से कटे सलाद और बिना छिलके उतारे फलों से बचें। तले-भुने और अधिक तेल वाले भोजन की बजाय ताजा भोजन, दही, छाछ, उबला या फिल्टर किया हुआ पानी तथा हर्बल चाय का सेवन करने की सलाह दी गई है। साथ ही बासी भोजन से बचने और बाहर निकलते समय छाता या रेनकोट साथ रखने को कहा गया है।

पशुपालकों के लिए जारी सलाह में कहा गया है कि वर्षा ऋतु में अधिक नमी और तापमान के कारण पशुओं में चिचड़, पिस्सू, मक्खी और मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है, जिससे थिलेरियोसिस, एनाप्लाज्मोसिस और बबेसिओसिस जैसी बीमारियों का खतरा रहता है। इससे बचाव के लिए पशुशाला की नियमित सफाई, गोबर का उचित निपटान, पशुओं को कृमिनाशक दवा देना, पशुशाला में कीटनाशकों का छिड़काव, जालियों का उपयोग और दीवारों पर चुने की पुताई करने की सलाह दी गई है। बरसात में पशुओं को लंबे समय तक कीचड़ में न खड़ा रखने, हरे चारे के साथ सूखा चारा देने तथा खुरपका-मुंहपका, पीपीआर और भेड़-बकरी पॉक्स जैसे रोगों से बचाव के लिए नियमित टीकाकरण कराने पर भी जोर दिया गया है।

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मुर्गीपालकों को पोल्ट्री शेड की समय रहते मरम्मत करने तथा फफूंद रहित सूखा और ताजा आहार सुरक्षित रखने की सलाह दी गई है। वहीं मत्स्य पालकों से कहा गया है कि वर्षा के दौरान तालाबों में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें, तटबंधों की मरम्मत करें तथा मानसून से पहले तालाबों से गाद निकालें, ताकि मछलियों के लिए स्वस्थ वातावरण बना रहे।

विश्वविद्यालय ने किसानों एवं पशुपालकों से आग्रह किया है कि वे अपने क्षेत्र की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि, उद्यान एवं पशुपालन अधिकारियों से संपर्क करें। कृषि तकनीकी सूचना केंद्र (एटीआईसी) पालमपुर से भी दूरभाष 01894-230395 पर संपर्क कर आवश्यक तकनीकी सलाह प्राप्त की जा सकती है।

Aapki Baat News Desk
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