भारत रंग महोत्सव के 25 वर्ष पूर्ण होने पर जालग में पांजवा वेद लोकनाट्य का मंचन

इस लोकनाट्य में ऋषिगण भरत मुनि से प्रश्न करते हैं कि जब हमारे पास चार वेद उपलब्ध थे और इन चारों वेदों में जगत का सारा रहस्य छिपा है और यह परिपूर्ण है तो पांचवां वेद बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

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राजगढ़|
आसरा संस्था की ओर से हाब्बी मान सिंह कला केंद्र जालग में पांजवा वेद लोकनाट्य का मंचन किया गया. इस लोकनाट्य का प्रदर्शन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के निर्देशानुसार भारत रंग महोत्सव के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली के विश्व जन रंग के अंतर्गत किया गया.

आसरा संस्था के प्रभारी डॉ. जोगेंद्र हाब्बी ने बताया कि यह लोकनाट्य विशेष रूप से भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र के महत्व के बारे में प्रकाश डालता है. पांचवा वेद लोकनाट्य का मंचन करियाला शैली में किया गया. इस लोकनाट्य में ऋषिगण भरत मुनि से प्रश्न करते हैं कि जब हमारे पास चार वेद उपलब्ध थे और इन चारों वेदों में जगत का सारा रहस्य छिपा है और यह परिपूर्ण है तो पांचवां वेद बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भरत मुनि कहते हैं कि मनुष्य को ज्ञान प्राप्त करने में सहूलियत हो, इसी उद्देश्य से पंचम वेद अर्थात नाट्यशास्त्र की रचना की गई. चारों वेदों के अंगों को मिलाकर नाट्यशास्त्र का जन्म हुआ है.

आज हम जो रंगमंच व लोकनाट्य देख रहे हैं इसका आधार नाट्य शास्त्र ही है. नाटक और स्वांग एक ऐसा माध्यम है जिसमें देखने और सुनने से एक साथ ज्ञान व शिक्षा मिलती है. इसके माध्यम से समाज में फैली अच्छाई और बुराई की वास्तविक तस्वीर जनता के समक्ष रखी जा सकती है. इससे पथभ्रष्ट मनुष्यों को जीवन की सही राह दिखाई जा सकती है.

पांजवा वेद लोकनाट्य का प्रदर्शन गुरु पद्मश्री विद्यानंद सरैक के मार्गदर्शन और वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोक कलाकार डॉ. जोगेंद्र हाब्बी के निर्देशन में किया गया. लोकनाट्य के पात्रों में मुख्य भूमिका उस्ताद बिस्मिल्ला खान युवा पुरस्कार से सम्मानित कलाकार गोपाल हाब्बी व रामलाल वर्मा, दिनेश कुमार, चमन लाल, संदीप कुमार, अमी चंद ने निभाई. इसके अलावा सरोज, सुनील, अनु, आरती, सीमा, हेमलता, अमन आदि कलाकारों ने भी अपने किरदार को बखूबी निभाया.

इस लोकनाट्य में कलाकारों ने ग्रामीण परिवेश और स्थानीय बोली में बताया कि नाटकों और लोकनाट्यों का समाज में जागरूकता लाने में पहले भी योगदान रहा है और भविष्य में भी रहेगा. नाटकों एवं लोकनाट्यों के द्वारा समाज में फैली बुराइयों के प्रति जागरूकता लाकर समाज में बदलाव लाया जा सकता है.