श्री रेणुकाजी : भाजपा के वरिष्ठ नेता मेलाराम शर्मा को दूसरी बार जिला भाजपा प्रवक्ता की जिम्मेदारी सौंपने के फैसले ने श्री रेणुकाजी विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक गलियारों में फिर से पुरानी चर्चा को जन्म दिया है।
यह नियुक्ति सामान्य नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता से जुड़ी है, जिनके अनुभव और स्थानीय पकड़ को देखते हुए उनके समर्थकों को प्रदेश संगठन में बड़े पद की पूरी उम्मीद थी।
दरअसल, मेलाराम शर्मा का राजनीतिक कद बीडीसी चेयरमैन और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में उपनिदेशक जैसे बड़े पदों के अनुभव से ऊपर हैं।
राजनीति के साथ-साथ उनके पास मीडिया प्रबंधन का व्यापक अनुभव है। उन्हें प्रदेश संगठन में जगह न देकर, उन्हें दोबारा जिला स्तर पर ही ‘रिटेन’ करने के पीछे संगठन की रणनीति पर सस्पेंस बना हुआ है।
श्री रेणुकाजी वह विधानसभा क्षेत्र है, जहां सिरमौर जिले में भाजपा सबसे कमजोर है और जहां से वर्तमान में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष काबिज हैं। भाजपा यहां संसदीय चुनाव में लीड लेती है, लेकिन विधानसभा में हार जाती है।
श्री रेणुकाजी क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष चुने जाने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि शीर्ष नेतृत्व अब यहां से बड़े अनुभवी चेहरे को भाजपा प्रदेश संगठन में जगह देगा, लेकिन फिर से वही पद देकर कार्यकर्ताओं को भी निराश किया है।
यहां वरिष्ठ नेता होने के बावजूद उन्हें प्रदेश संगठन में जगह न देना, आंतरिक गुटबाजी या किसी बड़े गुट के दबाव को भी दर्शाता है। समर्थकों की खुली निराशा इस बात का संकेत देती है कि उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला है।
उधर, मेलाराम शर्मा ने इस जिम्मेदारी को निष्ठा और ईमानदारी से निभाने की प्रतिबद्धता जताई है और प्रदेश एवं जिला नेतृत्व का आभार व्यक्त किया है।
हालांकि, पार्टी के इस फैसले से पैदा हुआ यह सस्पेंस बरकरार है कि क्या यह ‘सीमित’ नियुक्ति रेणुकाजी का किला जीतने की अचूक रणनीति है या अनुभवी कार्यकर्ताओं के लिए एक निराशाजनक संदेश।
सिरमौर जिले की राजनीति इस समय दो प्रदेश अध्यक्षों के केंद्र में है। एक ओर पूर्व मंत्री डॉ. राजीव बिंदल नाहन से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं, तो वहीं दूसरी ओर श्री रेणुकाजी के विधायक विनय कुमार हाल ही में कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त हुए हैं। ऐसे में आगामी चुनाव में दोनों ही दलों का सबसे बड़ा फोकस सिरमौर की पांचों विधानसभा सीटों को जीतना होगा।
हालांकि, भाजपा के लिए श्री रेणुकाजी सीट जीतना किसी बड़ी कठिन परीक्षा से कम नहीं है। 2012 में उपचुनाव जीतने के बाद पार्टी यहां लंबे समय से जीत दर्ज नहीं कर पाई है।
ये जीत भी इसलिए मिली मानी जाती है, क्योंकि उस समय प्रदेश में प्रो. प्रेम कुमार धूमल की सरकार थी। इस जीत में भी सबसे सक्रिय भूमिका पांवटा साहिब के विधायक सुखराम चौधरी की रही।
जाहिर है कि इस सीट को जीतने के लिए भाजपा को न सिर्फ अनुभवी नेताओं को संगठन में मान-सम्मान देना जरूरी है, बल्कि आंतरिक गुटबाजी को खत्म करके नेताओं को एक बेहतर मंच प्रदान करना भी आवश्यक है।
इसी बीच वरिष्ठ नेता मेलाराम शर्मा को दूसरी बार जिला प्रवक्ता पद पर नियुक्त करने के फैसले ने पार्टी के भीतर ही निराशा पैदा कर दी है। समर्थकों का मानना है कि रेणुकाजी में नेताओं की उपेक्षा और गुटबाजी उसकी चुनावी संभावनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।
जब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष स्वयं इसी सीट से विधायक हैं, तब भाजपा को रेणुकाजी जैसी सीट की चुनौती से निपटने के लिए एक ठोस और निर्विवाद रणनीति अपनाने की सख्त जरूरत है।





