नाहन : अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुकाजी मेला यदि धार्मिक तीर्थ की पहचान के अनुरूप आयोजित किया जाए और व्यावसायिक गतिविधियों को डेल्टा क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाए तो मेले की कई बड़ी समस्याओं का एक साथ समाधान हो सकता है।
डेल्टा में दुकानों, झूलों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के साथ पर्याप्त पार्किंग विकसित करने से मेले के दौरान सड़क किनारे और कई किलोमीटर दूर तक वाहनों की कतार लगने की स्थिति खत्म हो सकती है। इससे यातायात व्यवस्था संभालने में जुटी पुलिस और प्रशासन को भी बड़ी राहत मिलेगी।
श्री रेणुकाजी तीर्थ और धार्मिक गतिविधियों से जुड़े बुद्धिजीवियों का कहना है कि कुब्जा पवेलियन क्षेत्र को व्यावसायिक बाजार के बजाय देव संस्कृति और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बनाया जाना चाहिए। सिरमौर के अलग-अलग देवस्थलों से आने वाले देवताओं की पालकियों के स्वागत, धार्मिक आयोजन और श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी गतिविधियों के लिए इस क्षेत्र को विकसित किया जा सकता है। इससे श्री रेणुका जी तीर्थ का धार्मिक स्वरूप और अधिक स्पष्ट होकर सामने आएगा।
वर्तमान व्यवस्था में मेले के दौरान कुब्जा पवेलियन स्थल, परशुराम तालाब और श्री रेणुकाजी झील के आसपास बड़ी संख्या में दुकानें, झूले और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां होती हैं। इससे श्रद्धालुओं की आवाजाही, यातायात और धार्मिक गतिविधियों पर भी असर पड़ता है। दूसरी ओर गिरि-जलाल नदी का डेल्टा क्षेत्र मेले के दौरान बड़े हिस्से में खाली रहता है। लोगों का सुझाव है कि डेल्टा क्षेत्र का उपयोग सुनियोजित तरीके से मेला बाजार और पार्किंग के लिए किया जा सकता है।
करीब 2000 वाहनों की पार्किंग
डेल्टा क्षेत्र में व्यवस्थित पार्किंग विकसित होने पर मेले के दौरान सबसे बड़ी समस्या मानी जाने वाली वाहनों की पार्किंग का समाधान हो सकता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने वाहन लेकर आते हैं और पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण वाहनों को काफी दूरी पर खड़ा करना पड़ता है। इससे मेला क्षेत्र तक पहुंचने वाली सड़कों पर यातायात का दबाव बढ़ता है और अकसर जाम जैसी स्थिति बनती है।
स्थानीय लोगों के अनुसार डेल्टा क्षेत्र में करीब 2000 वाहनों की पार्किंग विकसित करने की संभावना पर काम किया जा सकता है। यदि पार्किंग और व्यावसायिक गतिविधियां एक ही क्षेत्र में सुनियोजित तरीके से विकसित हों तो श्रद्धालुओं के वाहनों का दबाव मुख्य तीर्थ क्षेत्र से काफी हद तक बाहर रखा जा सकता है।
इससे पुलिस को भी लगातार यातायात नियंत्रण और वाहनों को व्यवस्थित करने में लगने वाले अतिरिक्त संसाधन नहीं लगाने पड़ेंगे। मेले के दौरान पुलिस और प्रशासन का ध्यान यातायात नियंत्रण के बजाय श्रद्धालुओं की सुरक्षा और धार्मिक आयोजन की व्यवस्थाओं पर अधिक केंद्रित हो सकेगा।
तीर्थ क्षेत्र में श्रद्धालुओं को मिलेगा सुकून
लोगों का ये भी कहना है कि श्री रेणुकाजी केवल एक मेला स्थल नहीं, बल्कि हिमाचल के प्रमुख धार्मिक तीर्थों में शामिल है। इसलिए इसके मुख्य क्षेत्र में ऐसी गतिविधियां होनी चाहिए, जिनसे श्रद्धालु देव संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़ सकें।
यदि बाजार और मनोरंजन से जुड़ी व्यावसायिक गतिविधियां डेल्टा क्षेत्र में सीमित कर दी जाएं और कुब्जा पवेलियन को देव संस्कृति का केंद्र बनाया जाए तो श्रद्धालु बिना अत्यधिक भीड़, जाम और शोर-शराबे के मंदिरों में आसानी से शीश नवाकर धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो सकेंगे।
धार्मिक विद्वानों का सुझाव है कि हिमाचल के अलग-अलग हिस्सों से देवताओं की पालकियों को आमंत्रित कर यहां देव संस्कृति को प्रमुखता दी जा सकती है। जिस तरह कुल्लू दशहरा में देव संस्कृति आयोजन का केंद्र रहती है, उसी तरह श्री रेणुकाजी मेले में भी देव परंपराओं और धार्मिक गतिविधियों को प्रमुख स्थान देने की आवश्यकता है।
वेटलैंड की सेहत भी बड़ा सवाल
श्री रेणुकाजी झील और इसके आसपास का क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से भी संवेदनशील है। यह क्षेत्र वेटलैंड है और यहां बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही के साथ व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ने से कचरे का दबाव भी बढ़ता है। मेले के बाद टनों के हिसाब से प्लास्टिक और अन्य कचरा हटाना पड़ता है।
लोगों का कहना है कि धार्मिक आयोजन की भव्यता के साथ तीर्थ की स्वच्छता और पर्यावरण को प्राथमिकता देना भी जरूरी है। हजारों श्रद्धालुओं के आने वाले आयोजन में यदि दुकानें, झूले और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संवेदनशील क्षेत्र के आसपास अधिक होंगी तो कचरे का दबाव भी बढ़ेगा। इसलिए व्यावसायिक गतिविधियों को अपेक्षाकृत खुले डेल्टा क्षेत्र में व्यवस्थित करना और मुख्य तीर्थ क्षेत्र को स्वच्छ एवं शांत रखना पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहतर विकल्प हो सकता है।
झील की पारिस्थितिकी को लेकर पहले से ही पोषक तत्वों की बढ़ती मात्रा और जलीय वनस्पतियों के फैलाव जैसी चिंताएं सामने आती रही हैं। ऐसे में मेले के दौरान उत्पन्न होने वाले प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरे को कम करना भी जरूरी है।
क्या श्री रेणुकाजी मेले को फिर धार्मिक पहचान के अनुरूप ढाला जाएगा?
पंडित नितिश भारद्वाज, राजीव शर्मा, राहुल, उदय सिंह सहित धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने मेले के स्वरूप में बदलाव की मांग उठाई है। उनका कहना है कि श्री रेणुकाजी मेले की पहचान केवल बाजार, झूलों और भीड़ से नहीं, बल्कि देव संस्कृति और आस्था से होनी चाहिए।
उनका सुझाव है कि डेल्टा क्षेत्र को व्यावसायिक गतिविधियों और पार्किंग के लिए विकसित किया जाए, जबकि कुब्जा पवेलियन सहित मुख्य तीर्थ क्षेत्र को धार्मिक आयोजनों और देव संस्कृति के लिए रखा जाए। इससे एक तरफ श्रद्धालुओं को जाम और शोर से राहत मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ श्री रेणुका जी तीर्थ की धार्मिक गरिमा और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को भी बेहतर तरीके से सुरक्षित रखा जा सकेगा।
अब सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में श्री रेणुकाजी मेले की व्यवस्था को इस तरह बदला जाएगा कि बाजार तीर्थ क्षेत्र से बाहर और देव संस्कृति तीर्थ के केंद्र में दिखाई दे। ये आने वाला वक्त बताएगा। इसको लेकर जिला प्रशासन और स्थानीय राजनीतिक दलों को भी समय के साथ इस व्यवस्था में बड़े बदलाव को लेकर प्रयास करने होंगे।
