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नवरात्रि में अद्भुत तप! नौ दिन छाती पर जौ उगाकर कठिन हठयोग में लीन रहे मौनधारी बाबा

इस अद्भुत साधना को देखने और बाबा के दर्शन पाने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु सालवाला पहुंचे। मंदिर परिसर में सुबह से ही आस्था, श्रद्धा और भक्ति का माहौल बना हुआ है।

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नाहन : देवभूमि हिमाचल की पावन धरती पर नवरात्रि के पावन अवसर पर एक ऐसा अद्भुत और रोमांचित कर देने वाला दृश्य सामने आया है, जिसने हर किसी को हैरान किया तो भाव-विभोर भी। जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र की सालवाला पंचायत में पुरुवाला-भटरोग मार्ग पर गिरि नदी के किनारे स्थित प्राचीन महाकालेश्वर मंदिर में एक मौनधारी बाबा पिछले नौ दिनों से अपने वक्षस्थल पर जौ उगाकर कठिन हठयोग और तपस्या में लीन रहे।

शुक्रवार को नवरात्रि समापन के पावन अवसर पर बाबा ने फलाहार ग्रहण कर अपना व्रत खोला। इस अद्भुत साधना को देखने और बाबा के दर्शन पाने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु सालवाला पहुंचे। मंदिर परिसर में सुबह से ही आस्था, श्रद्धा और भक्ति का माहौल बना हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई सामान्य व्रत या साधना नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, आत्मसंयम, तप और लोककल्याण का जीवंत उदाहरण है। नवरात्रि के दौरान जहां हर घर और मंदिर में जौ बोए जाते हैं, वहीं किसी संत द्वारा अपनी छाती पर जौ उगाकर तपस्या करना लोगों के लिए आश्चर्य और गहरी आस्था का विषय बन गया है।

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श्रद्धालुओं का कहना है कि “यह केवल साधना नहीं, बल्कि सनातन शक्ति की अनुभूति है।” वहीं कई भक्त इसे “देवभूमि हिमाचल की तपोभूमि पर साक्षात आस्था का चमत्कार” मान रहे हैं। बताया जा रहा है कि बाबा ने नवरात्रि के प्रथम दिन से लेकर आज तक पीठ के बल लेटकर यह कठिन हठयोग किया। इस दौरान उन्होंने अन्न ग्रहण नहीं किया और केवल पानी की बूंदों के सहारे अपनी साधना जारी रखी। यही नहीं, बाबा पिछले करीब दो वर्षों से मौन व्रत और फलाहार व्रत में हैं। वह किसी से बोलते नहीं और अपनी बात इशारों या लिखकर बताते हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार बाबा ने संकेतों में यही बताया कि वह यह सब जग कल्याण, क्षेत्र की सुख-शांति, नकारात्मक शक्तियों के नाश और प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा की भावना से कर रहे हैं। ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के अनुसार नवरात्रि में जौ उगाने की परंपरा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि समृद्धि, शुद्धता, उन्नति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में बाबा द्वारा अपने शरीर को ही साधना का माध्यम बनाना इस तपस्या को और अधिक विलक्षण बना देता है। कई श्रद्धालु इसे आस्था का दुर्लभ अवसर मान रहे हैं।

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स्थानीय निवाई पंडित अमित कुमार शर्मा और प्रदीप सिंह ने बताया कि बाबा का वास्तविक नाम खत्री राम है और वह इसी क्षेत्र से संबंध रखते हैं। उन्होंने विवाह नहीं किया और बाद में सन्यास मार्ग अपना लिया। बताया गया कि उन्होंने गुरु धारण कर रखा है और उनके गुरु का नाम बृहस्पति नाथ है।
स्थानीय लोगों के अनुसार बाबा अभी अपनी साधना के प्रथम चरण में हैं, जिसमें वह जप, तप और व्रत कर रहे हैं। आगे की आध्यात्मिक प्रक्रिया और नामकरण भी उनके गुरु के मार्गदर्शन में ही होगा।

गांव के लोगों ने यह भी बताया कि बाबा इससे पहले भी सवा महीने तक खड़े रहकर तपस्या कर चुके हैं। यही नहीं, श्रद्धालुओं के अनुसार उस तपस्या के दौरान सातवें दिन एक नाग भी उनके पास दिखाई दिया था, जिसके फन पर ‘ॐ’ अंकित होने की बात कही जाती है। लोगों का दावा है कि जब कुछ भक्तों ने उसे हटाने का प्रयास किया तो वह अचानक दृष्टि से ओझल हो गया। इस घटना को भी लोग गहरी आस्था और दिव्य संकेत के रूप में देख रहे हैं।

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सबसे हैरान करने वाली बात यह भी है कि जिस कुटिया में बाबा तपस्या कर रहे हैं, वहां पक्की छत तक नहीं है। ऊपर केवल एक तिरपाल डाली गई है, जिससे बरसात के समय पानी भी भीतर तक टपकता है। इसके बावजूद बाबा की साधना और एकाग्रता में कोई कमी नहीं आई। सालवाला के महाकालेश्वर मंदिर में दिखी यह साधना इन दिनों पूरे क्षेत्र में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक चर्चा का बड़ा केंद्र बनी हुई है।