शिमला : हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला सिरमौर के अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुका जी मेले के आयोजन को लेकर पर्यावरण संरक्षण के मामले में कड़ा रुख अपनाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि 19 से 24 नवंबर 2026 तक आयोजित होने वाले मेले के दौरान सभी व्यावसायिक गतिविधियां केवल मेला मैदान तक सीमित रहेंगी। श्री रेणुकाजी झील और परशुराम ताल के आसपास 100 मीटर के दायरे में किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्वच्छता, कचरा प्रबंधन, ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण और अतिक्रमण रोकने सहित 12 बिंदुओं पर प्रशासन को निर्देश जारी किए हैं। मामले की अगली सुनवाई 15 दिसंबर 2026 को होगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रस्तुत तस्वीरों और एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट में पाया कि तस्वीरों में परशुराम ताल की परिक्रमा के आसपास भी दुकानें और स्टॉल लगाए जाने की स्थिति सामने आई है। यह क्षेत्र इको-फ्रैजाइल जोन का हिस्सा है।
एमिकस क्यूरी ने अदालत को बताया कि परशुराम ताल, माता श्री रेणुकाजी मंदिर और मेला मैदान अलग-अलग स्थानों पर स्थित हैं। ऐसे में व्यावसायिक गतिविधियों को केवल मेला मैदान तक सीमित रखा जाना चाहिए। परशुराम ताल के आसपास टेंट लगाने और दुकानें स्थापित करने पर भी रोक रहनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने 5 दिसंबर 2024 की पिछली निरीक्षण रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट में मेले के बाद बड़ी संख्या में आवारा पशुओं के कचरे में भोजन तलाशने, प्लास्टिक के ढेर जमा होने और परशुराम ताल के आसपास गंदगी फैलने की बात सामने आई थी। एक मृत पशु का भी उल्लेख किया गया था, जिसकी मौत प्लास्टिक निगलने के कारण होने की आशंका जताई गई थी।
निरीक्षण के दौरान शौचालयों की हालत भी खराब मिली थी। शौचालयों में पानी उपलब्ध नहीं था और कई शौचालय बंद पड़े थे। इसके चलते खुले में शौच की स्थिति बनी हुई थी। अदालत ने इन खामियों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मेले के आयोजन से संबंधित अनुमतियों और व्यवस्थाओं को अधिक व्यवस्थित एवं समन्वित तरीके से नियंत्रित करने की जरूरत है।
अदालत ने निर्देश दिए कि मेले से पहले ही स्वच्छता और कचरा प्रबंधन की पूरी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। करीब 10 हजार लोगों की आवाजाही को ध्यान में रखते हुए कम से कम 100 अस्थायी शौचालय बनाए जाएं। इसके साथ ही सफाई कर्मचारियों और पर्यवेक्षकों की संख्या भी जरूरत के अनुसार बढ़ाई जाए।
व्यावसायिक गतिविधियों में शामिल विक्रेताओं के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने को कहा गया है, जिसके तहत वे अपने द्वारा उत्पन्न प्लास्टिक कचरे को वापस ले जाने के लिए जिम्मेदार होंगे। इसका उद्देश्य झील और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे के जमाव को रोकना है।
हाईकोर्ट ने वन्यजीव अभयारण्य की सीमा के भीतर मेले के दौरान लाउडस्पीकर और तेज आवाज वाले ध्वनि उपकरणों के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई है। वन विभाग और पुलिस को इन निर्देशों का सख्ती से पालन करवाना होगा।
सभी सांस्कृतिक मंच अभयारण्य की सीमा से बाहर स्थापित किए जाएंगे, जबकि झील किनारे स्थित मंदिरों के आसपास साइलेंस जोन बनाए रखना होगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को प्रतिदिन ध्वनि स्तर की रीडिंग लेने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अदालत ने मेले के प्रवेश द्वारों पर प्लास्टिक की बिक्री और उसके इस्तेमाल की निगरानी के लिए संयुक्त फ्लाइंग स्क्वॉड तैनात करने को कहा है।
इस स्क्वॉड को चालान करने की शक्तियां भी दी जाएंगी, ताकि प्रतिबंधित प्लास्टिक के इस्तेमाल पर कार्रवाई हो सके। साथ ही विक्रेताओं द्वारा मौके पर कचरा जलाने की घटनाओं को पूरी तरह रोकने के निर्देश दिए गए हैं।
शौचालयों की सफाई, अस्थायी शौचालयों के रखरखाव और कचरे के निस्तारण के लिए दिए जाने वाले ठेकों की निगरानी रेणुका जी विकास बोर्ड करेगा। यदि क्षेत्र में कोई मृत पशु मिलता है तो उसे 48 घंटे के भीतर हटाने की व्यवस्था करनी होगी।
पशुपालन विभाग और ग्राम पंचायतों को आवारा पशुओं को मेला मैदान और झील के किनारों से दूर रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इको-फ्रैजाइल क्षेत्रों में दुकानदारों को अनिश्चित अवधि तक स्टॉल लगाने की छूट नहीं दी जा सकती। प्रशासन को दुकानदारों के परिसर में रहने की अवधि निर्धारित करनी होगी।
मेले के समापन के तीन दिनों के भीतर सभी स्टॉल हटाने अनिवार्य होंगे। इसके साथ ही दुकानदारों को अपने कब्जे वाले स्थान की सफाई करने का प्रमाणपत्र भी देना होगा।

