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रील्स से पहचान, मिट्टी से हुनर को मुकाम देने की कोशिश; नाहन का प्रियांशु अब यूथ फेस्टिवल में दिखाएगा कला

हाथों में मिट्टी लेकर उसे मनचाहा आकार देना और उससे कलाकृति तैयार करना अब उसके लिए महज शौक नहीं रहा।

नाहन : आज के दौर में जब युवाओं की रचनात्मकता मोबाइल स्क्रीन, कैमरे और सोशल मीडिया के इर्द-गिर्द घूम रही है, नाहन का प्रियांशु पुंडीर मिट्टी के साथ अपनी अलग दुनिया रच रहा है।

हाथों में मिट्टी लेकर उसे मनचाहा आकार देना और उससे कलाकृति तैयार करना अब उसके लिए महज शौक नहीं रहा। क्ले मॉडलिंग के प्रति इसी जुनून ने उसे कॉलेज के यूथ फेस्टिवल में अपने संस्थान का प्रतिनिधित्व करने तक पहुंचा दिया है।

बनोग निवासी प्रियांशु पुंडीर डॉ. यशवंत सिंह परमार स्नातकोत्तर महाविद्यालय नाहन में अंग्रेजी विषय में मास्टर कर रहे हैं। पढ़ाई के साथ वह लगातार अपनी रचनात्मक रुचि को समय दे रहे हैं। मिट्टी से मॉडल तैयार करने की कला में उनकी दिलचस्पी ने उन्हें पारंपरिक कला के करीब ला दिया है।

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दिलचस्प बात यह है कि प्रियांशु खुद डिजिटल क्रिएटर भी हैं। उन्हें रील्स बनाना पसंद है और वह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी सक्रिय रहते हैं। यानी जिस पीढ़ी के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं, उसी पीढ़ी का यह युवा मिट्टी जैसी पारंपरिक कला को भी उतनी ही गंभीरता से अपना रहा है।

प्रियांशु की यह दोहरी रचनात्मकता उन्हें खास बनाती है। एक तरफ कैमरे और डिजिटल माध्यम के जरिए वह अपनी कल्पनाओं को अभिव्यक्त करते हैं तो दूसरी तरफ मिट्टी को हाथों से गढ़कर उसे एक नया रूप देते हैं। उनके लिए क्ले मॉडलिंग अपनी कल्पना को सामने लाने का ऐसा माध्यम है, जिसमें विचार को आकार देने की पूरी प्रक्रिया उनके हाथों से होकर गुजरती है।

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अब उनकी इसी प्रतिभा को बड़ा मंच मिला है। शिमला में आयोजित होने वाले यूथ फेस्टिवल में प्रियांशु क्ले मॉडलिंग के माध्यम से डॉ. यशवंत सिंह परमार स्नातकोत्तर महाविद्यालय नाहन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। कॉलेज का प्रतिनिधित्व करने का यह अवसर उनके लिए अपनी कला को व्यापक मंच पर प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण पड़ाव है।

मिट्टी की कला सिर्फ कलाकृति बनाने तक सीमित नहीं है। यह हमारी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ी रही है। ऐसे समय में जब पारंपरिक कलाओं के सामने आधुनिक माध्यमों की बड़ी चुनौती है, नई पीढ़ी के किसी युवा का इस कला को अपनाना अपने आप में सकारात्मक संकेत है।

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प्रियांशु की कहानी इसी बदलाव की तस्वीर पेश करती है। वह आधुनिक डिजिटल दुनिया का हिस्सा हैं, लेकिन अपनी रचनात्मकता को केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं रखना चाहते। मिट्टी को हाथों से आकार देते हुए वह उस परंपरा से भी जुड़ रहे हैं, जिसने पीढ़ियों से भारतीय कला को समृद्ध किया है। यूथ फेस्टिवल में उनका प्रतिनिधित्व करना इस सफर की एक नई शुरुआत है।

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