नाहन : हिमाचल प्रदेश में विकास और खनन जरूरी हैं, लेकिन इसकी कीमत पहाड़ों, जंगलों, जलस्रोतों और स्थानीय लोगों की सुरक्षा को चुकानी पड़े, यह स्वीकार्य नहीं है।
पहाड़ी समाज पर्यावरणी कवच फाउंडेशन के संस्थापक सेवानिवृत्त मेजर जनरल अतुल कौशिक ने संगड़ाह में 782 बीघा भूमि पर अवैज्ञानिक खनन के आरोपों की वैज्ञानिक जांच करवाने के साथ प्रदेश के उच्च पर्वतीय धार्मिक स्थलों पर बढ़ते मानवीय दबाव को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित पर्यटन और पर्यावरणीय वहन क्षमता से अधिक भीड़ हिमाचल के संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों के लिए गंभीर चुनौती बन रही है।
शुक्रवार को नाहन में पहाड़ी समाज पर्यावरणी कवच फाउंडेशन और वसुंधरा संरक्षण समिति संगड़ाह की संयुक्त पत्रकार वार्ता में अतुल कौशिक ने कहा कि प्रदेश में विकास का ऐसा मॉडल अपनाया जाना चाहिए, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि हो। उन्होंने चूड़धार, शिकारी देवी, श्रीखंड महादेव, मणिमहेश, शाली टिब्बा और बिजली महादेव सहित प्रमुख धार्मिक एवं उच्च पर्वतीय स्थलों पर बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप का मुद्दा उठाया।
वहन क्षमता से अधिक भीड़ पहाड़ों के लिए खतरा
अतुल कौशिक के अनुसार हिमाचल प्रदेश के 13 से 14 प्रमुख उच्च पर्वतीय धार्मिक स्थलों पर पर्यटकों और श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से पर्यावरणीय संतुलन पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने संवेदनशील क्षेत्रों की पर्यावरणीय वहन क्षमता निर्धारित करने का मुद्दा उठाया है, लेकिन इन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ स्थानों की दैनिक वहन क्षमता केवल 70 लोगों के आसपास होने के बावजूद वहां एक लाख तक लोगों के पहुंचने का दावा सामने आया है। ऐसे आंकड़ों की संबंधित स्थलों के संदर्भ में पुष्टि और प्रभावी निगरानी जरूरी है, ताकि पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप ही आवाजाही सुनिश्चित की जा सके।
ट्रेकिंग रूट और पैदल रास्तों से भी बढ़ रहा दबाव
अतुल कौशिक ने कहा कि कई संवेदनशील पर्वतीय स्थलों पर लोग ट्रेकिंग रूट, पैदल रास्तों और मोटर मार्गों से पहुंचते हैं। यदि आवाजाही व्यवस्थित न हो तो इससे पहाड़ों की मिट्टी कमजोर होने, भूस्खलन का खतरा बढ़ने और प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। बड़ी संख्या में पर्यटकों और श्रद्धालुओं के पहुंचने से प्लास्टिक सहित अन्य कचरा जमा होने तथा अस्थायी शिविरों और ईंधन की जरूरतों के कारण जंगलों पर दबाव बढ़ने की समस्या भी पैदा होती है।
उन्होंने मांग की कि एनजीटी के दिशा-निर्देशों और संबंधित पर्यावरणीय मानकों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या, कचरा प्रबंधन, जल-स्वच्छता और आपदा तैयारियों को लेकर ठोस व्यवस्था बनाई जाए, ताकि धार्मिक आस्था और पर्यटन के साथ प्राकृतिक विरासत की रक्षा भी हो सके।
90 से अधिक आरटीआई के जवाब नहीं मिलने का आरोप
अतुल कौशिक ने आरोप लगाया कि पर्यावरण, खनन और जनसुरक्षा से जुड़े मामलों में 90 से अधिक आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी गई, लेकिन स्पष्ट जवाब नहीं मिले। उन्होंने संबंधित विभागों की संयुक्त और निष्पक्ष जांच करवाने, प्रत्येक शिकायत की जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की समयसीमा निर्धारित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हुई तो संस्था कानूनी और अन्य स्तरों पर संघर्ष तेज करेगी।
संगड़ाह में 782 बीघा भूमि पर खनन की जांच की मांग
वसुंधरा संरक्षण समिति संगड़ाह के अध्यक्ष रणजीत चौहान और महासचिव सुरेंद्र सिंह कंठ ने आरोप लगाया कि संगड़ाह क्षेत्र में 782 बीघा भूमि पर अवैज्ञानिक तरीके से खनन किया जा रहा है। इस क्षेत्र में 5 माइनें चल रही हैं। उन्होंने खनन से वन्यजीवों, जलस्रोतों, कृषि भूमि और स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले प्रभावों की खदानवार वैज्ञानिक जांच करवाने की मांग की।
समिति ने नलगुण की ऐतिहासिक गुफा, वराह मंदिर, मंडोली मिडिल स्कूल, जल शक्ति विभाग की पाइपलाइनों और सड़कों की सुरक्षा को लेकर भी जांच की मांग उठाई। प्रेसवार्ता में अवैज्ञानिक खनन से प्रभावित ग्रामीण भी पहुंचे थे। समिति ने साफ कहा कि उन्हें माइनों से दिक्कत नहीं है, लेकिन जिस तरह से अवैज्ञानिक खनन किया जा रहा है और लोगों की जमीनों व प्रकृति को नुकसान पहुंच रहा है, उसके निकट भविष्य में गंभीर संकट पैदा होगा। लोगों की जमीनें और चरागाह आदि बर्बाद हो रहे हैं।
श्री रेणुकाजी रामसर साइट की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया
संस्थाओं ने श्री रेणुकाजी रामसर साइट और आरक्षित वन क्षेत्र को धार्मिक मेले के दौरान व्यावसायिक गतिविधियों और ध्वनि प्रदूषण से संभावित नुकसान से बचाने की मांग की। पदाधिकारियों ने कहा कि मेले की धार्मिक गरिमा बनाए रखने के साथ वन्यजीवों और प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा भी जरूरी है। जरूरत पड़ने पर इस मामले में न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
अतुल कौशिक ने स्पष्ट किया कि संस्थाओं का विरोध विकास या खनन से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय मानकों और जनसुरक्षा की अनदेखी से है। उन्होंने कहा कि हिमाचल के पहाड़ों, जलस्रोतों, जंगलों और स्थानीय आबादी के हितों की रक्षा के लिए पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।

