शिमला : शोषण मुक्ति मंच, हिमाचल प्रदेश ने शीर्ष कोर्ट के उस फैसले पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें कहा गया है कि ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जाएगा। मंच के पदाधिकारियों ने इस निर्णय को सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए पुनर्विचार की मांग उठाई है।
मंच के राज्य संयोजक आशीष कुमार, सह संयोजक राजेश कोष और मिंटा जिंटा ने अपने संयुक्त वक्तव्य में कहा कि आरक्षण का मुद्दा किसी धर्म विशेष से नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि जब तक समाज में वर्गीय और जातिगत असमानताएं बनी रहेंगी, तब तक वास्तविक बराबरी संभव नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में स्वतः बदलाव नहीं आता और न ही उसके साथ होने वाला भेदभाव खत्म होता है। ऐसे में केवल धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति को आरक्षण से वंचित करना अन्यायपूर्ण है और यह संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत है।
मंच ने मांग की है कि इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाए और इसे संविधान पीठ के समक्ष भेजा जाए, ताकि शोषित और वंचित वर्गों के अधिकारों की समुचित सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।



