नाहन : मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र के निधन से साहित्य और शायरी की दुनिया में शोक की लहर है। शहर के अदबी माहौल को जीवंत बनाए रखने वाली कलाधारा संस्था ने उनके निधन को साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति बताते हुए गहरा दुख व्यक्त किया है। बशीर बद्र का 91 वर्ष की आयु में भोपाल स्थित आवास पर निधन हुआ।
कलाधारा संस्था से नासिर यूसुफजई, भुवन जोशी, पंकज तन्हा, जावेद उल्फत, दीपराज विश्वास, दीपचंद कौशल, विजय रानी बंसल और सरला गौतम ने कहा कि बशीर बद्र की शायरी में दर्द भी था, अपनापन भी और जिंदगी की सच्चाइयों का गहरा एहसास भी।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कठिन अल्फाजों के बजाय आम बोलचाल की भाषा में दिल की बात कही। यही वजह रही कि उनके शेर केवल किताबों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि लोगों की जिंदगी और रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गए।
संस्था पदाधिकारियों ने कहा कि उनका मशहूर शेर, “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में…” आज भी संवेदनाओं को उतनी ही गहराई से छूता है और समाज को सोचने पर मजबूर करता है। बशीर बद्र की शायरी ने उर्दू अदब को नई पहचान दी और उनकी रचनाएं पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में जीवित रहेंगी।
शायर नासिर यूसुफजई ने अपनी शब्द श्रद्धांजलि में कहा कि बशीर बद्र का जाना साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपनी रचनाधर्मिता से उर्दू शायरी को नई ऊंचाइयां दीं। आम भाषा में गहरी संवेदनाओं को व्यक्त करने की उनकी क्षमता उन्हें विशिष्ट बनाती थी। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र अपने शब्दों और विचारों के माध्यम से हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेंगे।
