नाहन : सांप्रदायिक सौहार्द के लिए पहचान रखने वाले नाहन शहर में शुक्रवार को मुहर्रम मनाई गई। शहर के चार प्रमुख मोहल्लों से निकले चार ताजिए देर शाम जुलूस के रूप में जामा मस्जिद कच्चा टैंक पहुंचे। इसके बाद मस्जिद के निकट स्थित करबला में ताजियों को विदाई दी गई।
जुलूस के दौरान सुन्नी समुदाय के लोगों में विशेष उत्साह देखने को मिला। युवाओं ने शोज, सलाम, हदीसे और मर्शिया पढ़ते हुए मातम किया। इमाम हुसैन की याद में कई युवाओं ने पारंपरिक करतब दिखाए, जबकि बच्चों और युवाओं ने छाती पीटकर शोक व्यक्त किया। जुलूस मार्ग पर जगह-जगह श्रद्धालुओं के लिए पेय पदार्थों के स्टॉल भी लगाए गए।
खास बात ये है कि नाहन में वर्तमान में शिया समुदाय का कोई परिवार नहीं रहता, फिर भी सुन्नी मुस्लिम आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश करते हुए वर्षों से मुहर्रम की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। शहर के गुन्नूघाट, हरिपुर, रानीताल और कच्चा टैंक मोहल्लों से आकर्षक ताजिए सूर्यास्त से पहले जामा मस्जिद कच्चा टैंक पहुंचे, जहां सभी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहे।
ऐसे शुरू हुई मुहर्रम मनाने की परंपरा
नाहन में सुन्नी मुस्लिमों द्वारा मुहर्रम मनाने की परंपरा 18वीं शताब्दी में महाराजा शमशेर प्रकाश के समय शुरू हुई थी। उस समय शहर में कुछ शिया परिवार रहते थे। महाराजा शमशेर प्रकाश ने फरमान जारी किया था कि इस आयोजन में सभी धर्मों के लोग शामिल होंगे। समय के साथ शिया परिवार यहां से नहीं रहे, लेकिन सुन्नी मुस्लिम आज भी रियासतकाल से चली आ रही इस परंपरा को निरंतर निभा रहे हैं। मुहर्रम पर शिया समुदाय इमाम हुसैन की शहादत को याद करता है।
क्या है मुहर्रम?
मुस्लिम सोसायटी नाहन के अध्यक्ष कैप्टन सलीम अहमद और प्रदेश उपाध्यक्ष अधिवक्ता शकील अहमद शेख के अनुसार मुहर्रम कोई त्योहार नहीं, बल्कि इस्लामिक हिजरी कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी महीने से इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत होती है। यह शोक का महीना माना जाता है और इसकी 10वीं तारीख को रोज-ए-आशूरा कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि इसी महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके परिवार सहित 72 अनुयायियों की करबला (इराक) में शहादत हुई थी। इमाम हुसैन यजीद की सेना से लड़ते हुए शहीद हुए थे। उनकी शहादत की याद में मुहर्रम के दौरान शोक और मातम किया जाता है।