फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन के मुहूर्त को लेकर इस वर्ष विशेष स्थिति बन रही है, क्योंकि 2 मार्च की शाम से भद्रा लग रही है और 3 मार्च को पूर्ण चंद्र ग्रहण भी पड़ रहा है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार भद्रा काल में होलिका दहन निषिद्ध होता है, इसलिए भद्रा समाप्ति के बाद ही होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत माना गया है। निर्णयसिन्धु के अनुसार यदि पूर्णिमा पर ग्रहण हो तो पूर्व रात्रि में भद्रारहित समय में होली जलाना उचित होता है।

इस वर्ष 2 मार्च 2026 को शाम 6:00 बजे पूर्णिमा तिथि लगते ही भद्रा आरंभ होकर अगले दिन सूर्योदय से पूर्व 05:19 बजे तक रहेगी। इसलिए प्रदोष काल में होलिका दहन संभव नहीं है। भद्रा समाप्ति के बाद सूर्योदय से पहले 05:19 से 06:20 बजे तक का समय सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त माना गया है। यदि यह संभव न हो तो भद्रा के पुच्छ भाग में रात्रि 01:16 से 02:25 बजे के बीच होलिका दहन किया जा सकता है। शास्त्रों में भद्रा में होलिका दहन को अशुभ बताया गया है और इससे ग्रामदाह का दोष माना गया है।
3 मार्च को प्रदोष काल में होलिका दहन इसलिए भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस समय पूर्णिमा तिथि नहीं रहेगी और प्रतिपदा में होलिका दहन वर्जित है।
3 मार्च 2026 को पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा, जिसे धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह ग्रहण दोपहर 3:20 बजे से शाम 6:47 बजे तक रहेगा। भारत में चंद्रमा लगभग 6:26 बजे उदित होगा, इसलिए यहां ग्रहण का अंतिम चरण ही दिखाई देगा। हिमाचल प्रदेश में ग्रहण का अधिकतम प्रभाव शाम 6:20 से 6:47 बजे के बीच रहेगा।
चूंकि ग्रहण भारत में दृश्य रहेगा, इसलिए सूतक काल मान्य होगा। सूतक 3 मार्च की सुबह 6:20 बजे से आरंभ माना जाएगा। सूतक काल में मंदिरों के कपाट बंद रखे जाते हैं और मूर्तियों का स्पर्श नहीं किया जाता।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के समय भगवान विष्णु और भगवान शिव के मंत्रों का जप करना शुभ माना गया है। महामृत्युंजय मंत्र, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, गीता, रामायण या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना लाभकारी बताया गया है।
ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान कर घर में गंगाजल का छिड़काव करना, भगवान की मूर्तियों को स्नान कराकर पुनः पूजा करना और अन्न, वस्त्र या धन का दान करना शुभ फलदायी माना गया है। -पंडित पवन शर्मा



