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इंतजार खत्म! आज मां श्री रेणुकाजी से मिलने आएंगे भगवान परशुराम, सीएम करेंगे अंतरराष्ट्रीय मेले का आगाज

मुख्यमंत्री दोपहर 1ः35 बजे ददाहू में देव अभिनंदन और शोभा यात्रा का शुभारंभ करेंगे। सायं 6ः35 बजे रेणु मंच पर दीप प्रज्जवलित कर मेले का विधिवत शुभारंभ करने के साथ जनसमूह को संबोधित करेंगे।

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श्री रेणुकाजी : हिमाचल प्रदेश के प्राचीन और श्रद्धापूर्ण मेलों में से एक अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुकाजी मेले का इंतजार खत्म हुआ। कार्तिक मास की शुभ घड़ी में आज से 6 दिनों के लिए श्री रेणुकाजी की तीर्थ भूमि आस्था के रंग में रंग जाएगी।

यह कोई सामान्य मेला नहीं बल्कि मां श्री रेणुकाजी और उनके पुत्र भगवान परशुराम जी के उस अलौकिक मिलन का उत्सव है, जिसका साक्षी बनने के लिए लाखों श्रद्धालु वर्ष भर प्रतीक्षा करते हैं।

अगले 5 नवंबर तक चलने वाले इस मेले के साथ ही उत्तरी भारत के इस प्रसिद्ध तीर्थ स्थल पर धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक उल्लास की धूम शुरू हो जाएगी। यह मेला हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा के लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है।

मां-बेटे के वात्सल्य और श्रद्धा का अनूठा संगम
यह मेला हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक उत्तरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री रेणुकाजी में मनाया जाता है।

जनश्रुति के अनुसार भगवान परशुराम वर्ष में एक बार अपनी मां रेणुकाजी से मिलने आते हैं। हर किसी को इस दिव्य मिलन का बेसब्री से इंतजार होता है, जो मां रेणुका के वात्सल्य और पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा संगम है।

श्री रेणुका जी तीर्थ में नारी देह के आकार की प्राकृतिक झील स्थित है, जिसे मां रेणुकाजी की प्रतिछाया माना जाता है। इसी झील के किनारे मां रेणुकाजी और भगवान परशुराम जी के भव्य मंदिर स्थित हैं। 6 दिवसीय इस मेले में आसपास के कई ग्राम देवता अपनी-अपनी पालकी में सुसज्जित होकर इस दिव्य मिलन में शामिल होंगे।

मुख्यमंत्री करेंगे शुभारंभ
अंतरराष्ट्रीय श्री रेणुकाजी मेले का मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू विधिवत शुभारंभ करेंगे।  डीसी सिरमौर एवं श्री रेणुकाजी विकास बोर्ड की उपाध्यक्ष प्रियंका वर्मा ने बताया कि मुख्यमंत्री दोपहर 1ः35 बजे ददाहू में देव अभिनंदन और शोभा यात्रा का शुभारंभ करेंगे।

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सायं 6ः35 बजे रेणु मंच पर दीप प्रज्जवलित कर मेले का विधिवत शुभारंभ करने के साथ जनसमूह को संबोधित करेंगे। वह प्रथम सांस्कृतिक संध्या के मुख्य अतिथि भी होंगे। इस मेले का समापन 5 नवंबर को राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल करेंगे।

हर दिन भव्य आरती का आयोजन
डीसी ने बताया कि मेले की समस्त तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इस मर्तबा पहली बार मेले में प्रत्येक दिन माता रेणुकाजी की भव्य आरती का आयोजन होगा। मनोरंजन के लिए मेले में 5 सांस्कृतिक संध्याएं होंगी, जिनमें कलाकार जनसमूह का मनोरंजन करेंगे, जबकि अंतिम दिन भगवान परशुराम की कथा का मंचन होगा।

श्रद्धालुओं के लिए 1 नवंबर को प्रातः 4 बजे पवित्र रेणुकाजी झील में एकादशी स्नान और 5 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर स्नान का विशेष महत्व है। सुरक्षा के विशेष प्रबंध किए गए हैं।

भगवान परशुराम और मां रेणुका की अमर गाथा
यह कथा प्राचीन आर्यव्रत के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा है, जो भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम और उनकी माता रेणुकाजी के त्याग, प्रेम और अटूट बंधन को दर्शाती है।

प्राचीन काल में हैहयवंशी क्षत्रिय राजा राज करते थे, जिनकी राज पुरोहिती भृगुवंशी ब्राह्मण संभालते थे। इसी भृगुवंश में महर्षि ऋचिक के पुत्र महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ। उनका विवाह इक्ष्वाकु कुल के ऋषि रेणु की पुत्री रेणुका से हुआ।

यह दंपत्ति इस क्षेत्र में ‘तपे का टीला’ नामक स्थान पर तपस्या में लीन रहने लगा। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को माता रेणुका के गर्भ से भगवान परशुराम ने जन्म लिया, जिन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। परशुराम उन अष्ट चिरंजीवियों में शामिल हैं जो आज भी अमर हैं।

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महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु नामक एक दिव्य गाय थी, जिसे पाने की लालसा तत्कालीन राजाओं में थी। राजा सहस्त्रार्जुन, जिसे भगवान दत्तात्रेय से हजार भुजाओं का वरदान प्राप्त था। एक दिन कामधेनु मांगने आश्रम पहुंचा।

महर्षि जमदग्नि ने उसका और उसके सैनिकों का खूब सत्कार किया, लेकिन समझाया कि कामधेनु गाय कुबेर जी की धरोहर है, जिसे किसी को नहीं दिया जा सकता। यह सुनकर क्रोध से भरे सहस्त्रार्जुन ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी।

अपने पति की मृत्यु से शोकाकुल माता रेणुका स्वयं को राम सरोवर में समर्पित कर बैठीं, जिससे सरोवर का आकार स्त्री देह जैसा हो गया।

उस समय महेंद्र पर्वत पर तपस्या कर रहे भगवान परशुराम को अपनी योगशक्ति से माता-पिता के साथ हुए इस घटनाक्रम का बोध हुआ। तपस्या टूटते ही वह अत्यंत क्रोधित हुए और सहस्त्रबाहु को ढूंढने निकल पड़े। उन्होंने उसे आमने-सामने के युद्ध के लिए ललकारा और परमवीर परशुराम ने अपनी सेना सहित सहस्त्रबाहु का वध कर दिया।

प्रतिशोध पूर्ण होने के बाद भगवान परशुराम ने अपनी योगशक्ति का प्रयोग कर पिता जमदग्नि और माता रेणुका को पुनर्जीवित कर दिया। माता रेणुका ने अपने पुत्र को वचन दिया कि वह प्रति वर्ष कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को उनसे मिलने अवश्य आया करेंगी।

ये भी है एक अन्य कथा
एक दूसरी कथा भी प्रचलित है जो माता रेणुका के सतीत्व और परशुराम की पितृभक्ति की परीक्षा को दर्शाती है। इस कथा के अनुसार महर्षि जमदग्नि कठोर तपस्या में लीन रहते थे और उनकी पत्नी रेणुका पतिव्रता धर्म का पालन करती थीं।

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वह नित्य प्रतिदिन गिरि गंगा से जल लाती थीं। एक दिन जब वह जल लेकर सरोवर से आ रही थीं, तो उन्होंने दूर एक गंधर्व जोड़े को प्रेम क्रीड़ा में व्यस्त देखकर क्षण भर के लिए अपने मन को विचलित कर दिया और आश्रम पहुंचने में विलंब हो गया।

महर्षि जमदग्नि ने अपने अंतर्ज्ञान से विलंब का कारण जान लिया और रेणुका के सतीत्व पर संदेह करने लगे। क्रोधित ऋषि ने अपने सौ पुत्रों को एक-एक करके माता रेणुका का वध करने का आदेश दिया, परंतु उनमें से किसी ने भी पिता की आज्ञा का पालन नहीं किया। अंततः पुत्र परशुराम ने पिता की आज्ञा मानते हुए माता का वध कर दिया।

इससे प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि ने परशुराम से वर मांगने को कहा। परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करने के बाद अपने पिता से अपनी माता रेणुका को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगा।

माता रेणुका ने पुनर्जीवित होने पर यह वचन दिया कि वह प्रति वर्ष इस दिन डेढ़ घड़ी के लिए अपने पुत्र भगवान परशुराम से अवश्य मिला करेंगी। यह डेढ़ घड़ी का मिलन आज के लगभग डेढ़ दिन के बराबर माना जाता है।

तब से हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को यह मिलन होता है और यह प्रसिद्ध मेला आरंभ होता है, जो लोगों की श्रद्धा और भारी जनसैलाब को देखते हुए कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक आयोजित किया जाता है।