नाहन : कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं सिरमौर में दुधारू पशुओं में दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने और बांझपन जैसी समस्याओं से निजात दिलाने के मकसद से अपने प्रदर्शन इकाई में अजोला (जलीय फर्न) तैयार की है. ताकि, किसानों को इसकी खासियत और इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्वों की जानकारी मिल सके.
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दरअसल, अजोला एक तरह की जलीय फर्न है, जो हरे चारे के तौर पर काम करती है. इसमें पाए जाने वाले न्यूट्रिएंट्स न केवल पशुओं को पोषण प्रदान करते हैं, बल्कि पशुओं की कई समस्याओं को दूर करने में भी ये सहायक है. दुधारू पशुओं के लिए अजोला ड्राई फ्रूट्स से कम नहीं हैं. लिहाजा, कृषि वैज्ञानिक किसानों को भी परामर्श दे रहे हैं कि वह घर पर ही इसे तैयार कर सकते हैं. यदि किसी पशु में दुग्ध उत्पादन की कमी रहती है या फिर पोषक तत्वों की कमी है तो अजोला से इस कमी को दूर किया जा सकता है. इसमें कई तरह की बीमारियों से लड़ने की क्षमता है.
इसे खिलाने से पशुओं के दूध में वसा व वसा रहित पदार्थ सामान्य आहार खाने वाले पशुओं की अपेक्षा अधिक पाई जाती है. यह पशुओं में बांझपन निवारण में उपयोगी है. पशुओं के पेशाब में खून आने की समस्या फॉस्फोरस की कमी से होती है जो अजोला खिलाने से दूर हो जाती है. अजोला से पशुओं में कैल्शियम, फॉस्फोरस, लोहे की आवश्यकता की पूर्ति होती है जिससे पशुओं का शारीरिक विकास अच्छा है. अजोला में प्रोटीन, आवश्यक अमीनो एसिड, विटामिन (विटामिन ए, विटामिन बी-12 और बीटा-कैरोटीन) एवं खनिज लवण जैसे कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, आयरन, कापर, मैगनेशियम आदि प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.
इकाई स्थापित करने की विधि बेहद आसान
अजोला के लिए इकाई स्थापित करने की विधि काफी आसान है. इसके लिए कच्ची और पक्की कोई भी समतल और उपयुक्त जगह पर इसे स्थापित किया जा सकता है. इसके लिए टरबोलीन शीट की जरूरत होती है. 6 से 7 फीट जगह पर स्थापित होने वाली इस इकाई में किसी भी उपजाऊ खेत की 20 से 25 किलो मिट्टी और 4 से 5 किलोग्राम गोबर (गली-सड़ी) डालना होगा. इसके बाद इसे पानी से कवर करना होगा. इसमें एक से 2 किलो अजोला का बीज (पौधा) डालेंगे. इस पौधे की क्षमता ये है कि ये 24 घंटे में दोगुना हो जाता है.
ये भी हैं विशेष गुण
इस पौधे की विशेषता ये भी है कि ये वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन को अपनी ओर खींचता है. चार से पांच माह बाद इसका पानी खेतों में इस्तेमाल किया जा सकता है. ये पानी खेतों के लिए जैविक खाद का काम करेगा. धान के खेतों में भी अजोला युक्त पानी से उत्पादन में बढ़ोतरी देखी गई है. जब इसके पानी का रंग काला पड़ने लगे तो इसे बदलना जरूरी है. अजोला पर सीधी धूप नहीं पड़नी चाहिए. इसके लिए शैडिंग नेट का इस्तेमाल करना जरूरी है. ताकि, पौधों को छाया मिलती रहे.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
उधर कृषि विज्ञान केंद्र धौलाकुआं सिरमौर की पादप रोग विशेषज्ञ डा. शिवाली धीमान ने बताया कि किसानों को अजोला के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.