छात्रा की मौत को लेकर शोषण मुक्ति मंच ने संस्थागत भेदभाव, कथित यौन उत्पीड़न और पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल

शोषण मुक्ति मंच ने मांग की कि एफआईआर दर्ज करने में देरी और मामले को दबाने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाए और पीड़ित परिवार को सुरक्षा, न्याय और नियमानुसार समुचित मुआवजा प्रदान किया जाए।

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धर्मशाला : जिला कांगड़ा के धर्मशाला स्थित एक कॉलेज में अनुसूचित जाति वर्ग की छात्रा की मौत को लेकर शोषण मुक्ति मंच हिमाचल प्रदेश ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मंच का कहना है कि यह मामला केवल एक छात्रा की असामयिक मृत्यु का नहीं, बल्कि शैक्षणिक संस्थान के भीतर कथित संस्थागत जातीय भेदभाव, यौन उत्पीड़न और प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण है।

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शोषण मुक्ति मंच के अनुसार छात्रा की मृत्यु से पूर्व रिकॉर्ड किए गए बयान में उसने कॉलेज के एक प्रोफेसर पर जातीय आधार पर मानसिक उत्पीड़न करने और शारीरिक रूप से अशोभनीय व्यवहार करने के गंभीर आरोप लगाए थे। मंच का दावा है कि इन घटनाओं के चलते छात्रा लगातार भय, दबाव और गहरे अवसाद की स्थिति में चली गई।

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इसके बावजूद पीड़िता के अनुसूचित जाति से होने और आरोपों की गंभीरता के बाद भी पुलिस द्वारा लगभग दो महीने तक एफआईआर दर्ज न किया जाना अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न निवारण अधिनियम तथा भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन है, जो पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मंच ने कहा कि यदि इस प्रकरण में तत्काल SC/ST एक्ट सहित सभी प्रासंगिक धाराओं में एफआईआर दर्ज नहीं की गई, आरोपी प्रोफेसर को निलंबित कर निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच सुनिश्चित नहीं की गई और एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की गई तो यह अनुसूचित जाति वर्ग की छात्राओं की सुरक्षा और संविधान प्रदत्त समानता व न्याय की भावना पर गहरा आघात होगा।

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शोषण मुक्ति मंच ने मांग की कि एफआईआर दर्ज करने में देरी और मामले को दबाने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाए और पीड़ित परिवार को सुरक्षा, न्याय और नियमानुसार समुचित मुआवजा प्रदान किया जाए। इसके साथ ही छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों और पुलिस तंत्र को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

मंच का यह भी कहना है कि राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों में लिंग संवेदनशीलता समितियों और आंतरिक शिकायत समितियों को तत्काल प्रभाव से मजबूत, सक्रिय और जवाबदेह बनाया जाए। इन समितियों में महिला तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय का प्रतिनिधित्व अनिवार्य हो और शिकायतों के निपटारे के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की जाए।

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शोषण मुक्ति मंच ने यह मांग भी उठाई है कि पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों के आधार पर आरोपी प्रोफेसर को अशोभनीय व्यवहार, छेड़खानी और यौन उत्पीड़न से संबंधित धाराओं में तत्काल गिरफ्तार किया जाए, ताकि साक्ष्यों से छेड़छाड़ और गवाहों को प्रभावित करने की किसी भी संभावना को रोका जा सके।