नाहन में ‘वफा तुम कर नहीं सकते, समझ ये आ गया हमको’ ने जमाया रंग, मौका था…

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नाहन|
कलाधारा संस्था की ओर से नाहन में बहुभाषी जिला स्तरीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. भाषा एवं संस्कृति विभाग के सौजन्य से आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता उच्च शिक्षा उपनिदेशक सिरमौर डॉ. हिमेंद्र बाली ने की, जबकि वरिष्ठ कवि दीपचंद कौशल विशेष अतिथि रहे. मंच संचालन में भुवन जोशी ने शानदार ढंग से निभाते हुए कवियों को अंत तक बांधे रखा. Multilingual district level kavi sammelan in Nahan

इस मौके पर नवोदित कवयित्री अवंतिका ने सोबास ताखे, मैरी मां, मोंदिरा दा तौ पोत्ता.., मुकेश सहोत्रा ने आखरी पत्ता.., रिया पाल ने यूं तो लिखने का जज्बा नहीं रखती हूं.., कविता से कार्यक्रम का आगाज किया. नितिका ठाकुर ने मां यहां होती तो एक आंसू न आने देती.., सुनीता भारद्वाज ने आज रिश्ते सभी मौन हैं.., कविता सुनाई.

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वरिष्ठ साहित्यकार नासिर यूसुफजई ने वफा तुम कर नहीं सकते समझ ये आ गया हमको, हमें इस पर भी तुम से प्यार क्यूं है हम नहीं समझे.., गजल को तरन्नुम में सुनाकर खूब दाद पाई. वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार पंकज तन्हा ने मंदिर से सरोकार है न मंदिर से वास्ता, अपनी गरज में वहशी बने जा रहे हैं वो.., खेली थी रात को जिन्होंने खूं की होलियां, सुबह जगे तो रोये चले जा रहे हैं वो.., गजल से रंग जमाया. अलीशा ने स्त्री हारी नहीं उसे हराया गया, क्या कहेंगे लोग, यह कह कर चुप कराया गया.., से वाहवाही लूटी.

शायर जावेद उल्फत ने इश्क शिमला की बर्फबारी सा, कुछ बिखरना है, कुछ संवरना है.., अनंत आलोक ने तेरे रास्ते पे रख दी हैं दो आंखें, तू आए तो मैं ये आंखें उठाऊं.., और दीप राज विश्वास ने टूटे हैं दुश्मनों के भी हर बार हौंसलें, उठता हूं हर कदम पे गिराने के बावजूद.., से रंग जमाया.

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डॉ. हिमेंद्र बाली ने इस कदर खामोशी का कहर है, अपने में ही डूबा हुआ शहर है, मिलते हैं लोग नकाब पहनकर, रिश्तों में जैसे घुल गया जहर है.., और दीप चंद कौशल ने जिंदगी के चार दिन हंस के तू गुजार ले, तू किसी से प्यार कर तू किसी से प्यार ले.., कविता सुनाकर तालियां बटोरीं.

मान्या गुज्जर ने उसे मुझसे मुहब्बत है मगर है नहीं बोलता, कैसे छोड़ दूं उसे वो न भी नहीं बोलता.., विजय रानी बंसल ने सपने देखे थे.., उषा गुज्जर ने प्रेम और सरला गौतम ने मेरे घर से आती है महक.., डॉ. ईश्वर राही ने दिसंबर जाता है जनवरी आता है, इसी तरह हर बार नया साल आता है.., प्रताप पराशर ने रिश्ते नाते सभी भुलाती, मदहोशी का प्याला हूं.., प्रभात कुमार ने कवि होने पर आत्म संतुष्टि देने वाले प्रसिद्धि पा सकते हैं.., कविता प्रस्तुत की.

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प्रभात चौहान ने उमर ये मेरी बड़ी नासमझ है.., ऋतिक गौड़ ने कहते थे देंगे नौकरियां और धनवीर सिंह परमार ने सियासत से खेलना अच्छा नहीं होता.., कविता सुनाकर दाद पाई.