लाहौल स्पीति : हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति में 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन ग्लेशियल झील के बढ़ते जलस्तर ने संभावित आपदा के खतरे को लेकर प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। उपायुक्त एवं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की अध्यक्ष किरण भड़ाना सिस्सु से करीब 14 किलोमीटर की दुर्गम पैदल चढ़ाई कर खुद घेपन झील तक पहुंचीं। उन्होंने झील के जलस्तर, आसपास के भू-भाग और पानी के संभावित बहाव मार्ग का मौके पर जायजा लिया।
निरीक्षण के दौरान प्रशासन ने संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की स्थिति में पानी के आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंचने के समय को लेकर भी आकलन किया। उपलब्ध प्रारंभिक आकलन में करीब 22 मिनट का समय बताया गया है, जबकि मौके की भौगोलिक और व्यावहारिक परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन का मानना है कि पानी करीब पांच मिनट में भी आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि प्रशासन अब निकासी योजना, अर्ली वार्निंग सिस्टम, मॉक ड्रिल और त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था को और मजबूत करने में जुटा है।
डीसी ने अधिकारियों के साथ झील के बढ़े जलस्तर को नियंत्रित अथवा कम करने के सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्पों पर भी चर्चा की। उन्होंने संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ काम करने और झील से जुड़े प्रत्येक महत्वपूर्ण तथ्य व संभावित जोखिम का वैज्ञानिक एवं तकनीकी आकलन करने के निर्देश दिए। साथ ही उन्होंने अधिकारियों के साथ इस बात पर भी विचार-विमर्श किया कि बढ़े हुए जलस्तर को नियंत्रित अथवा कम करने के लिए व्यावहारिक एवं सुरक्षित उपाय क्या हो सकते हैं और ऐसी किसी भी संभावित स्थिति में किस प्रकार की कार्ययोजना अपनाई जा सकती है।
15 सदस्यीय टीम ने किया निरीक्षण
झील तक पहुंचने वाली टीम में कुल 15 अधिकारी और कर्मचारी शामिल रहे। अत्यधिक दुर्गम क्षेत्र होने के कारण टीम के अन्य सदस्यों के लिए झील के नीचे बेस कैंप में रात्रि विश्राम की व्यवस्था की गई। उपायुक्त मंगलवार को निरीक्षण के बाद लौट आईं, जबकि टीम के अन्य सदस्य बुधवार दोपहर बाद केलांग लौटे।
प्रशासन के अनुसार घेपन झील और इसके आसपास के क्षेत्र की लगातार निगरानी की जा रही है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की विशेषज्ञ टीम भी झील और आसपास के क्षेत्र का अध्ययन कर चुकी है।
ग्लेशियरों की स्थिरता पर भी रहेगी नजर
डीसी किरण भड़ाना ने कहा कि घेपन झील के आसपास बड़ी संख्या में ग्लेशियर और पर्वत मौजूद हैं। इनकी स्थिरता की नियमित निगरानी जरूरी है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों और पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिरता का समय-समय पर वैज्ञानिक आकलन सुनिश्चित करने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ समन्वय किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि संभावित खतरे को देखते हुए संवेदनशील क्षेत्रों के लिए प्रभावी निकासी योजना, नियमित जागरूकता कार्यक्रम और मॉक ड्रिल जरूरी हैं। समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की स्पष्ट व्यवस्था से संभावित आपदा के प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है।
घेपन झील में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम
जिला प्रशासन घेपन झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में भी काम कर रहा है। इसका उद्देश्य झील के जलस्तर सहित महत्वपूर्ण मानकों की लगातार निगरानी करना और खतरे की स्थिति में समय रहते चेतावनी जारी करना है। सी-डैक (C-DAC), तिरुवनंतपुरम द्वारा विकसित प्रणाली का सिस्सु झील में परीक्षण भी किया जा चुका है।
निरीक्षण में परियोजना अधिकारी आईटीडीपी अश्वनी कुमार शर्मा, उप वन क्षेत्रपाल लीला मणि, चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुषमा, डॉ. विक्रांत नेगी, बीआरओ 94 आरसीसी के प्रभारी अधिकारी कैप्टन हरिओम शरण, अग्निशमन केंद्र केलांग के प्रभारी रतन चंद सहित जल शक्ति विभाग, एचपीएसईबीएल, वन विभाग, होमगार्ड और अन्य विभागों के अधिकारी-कर्मचारी शामिल रहे।
