शिमला : जुन्गा से सटी करीब सात हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित कवालिया चोटी पर बीते सप्ताह शरारती तत्वों ने आग लगाकर भैंस पालकों के चार अस्थाई आवासीय शैड जला दिए। इस घटना से न केवल पशुपालकों को भारी नुकसान हुआ है, बल्कि दशकों से चली आ रही पारंपरिक पशुपालन व्यवस्था पर भी संकट खड़ा हो गया है। कवालिया चोटी पर मशोबरा ब्लॉक की अंतिम छोर की ग्राम पंचायत पीरन और सतलाई के पशुपालक हर वर्ष छह महीने तक भैंसों के साथ इन्हीं शैडों में अस्थाई रूप से कैंप लगाकर रहते हैं।

भैंस पालक जबर सिंह ठाकुर ने बताया कि जले हुए ये शैड काफी पुराने थे, जिनमें उनके पूर्वज भी अस्थाई तौर पर निवास करते थे। शैडों की छतें घास और लकड़ी से बनाई गई थीं। अब आगामी अप्रैल माह में फिर से यहां रहने के लिए नए शैड तैयार करने पड़ेंगे, जो आसान नहीं है, क्योंकि इस दुर्गम चोटी तक निर्माण सामग्री पहुंचाना सबसे कठिन कार्य होता है। उनका कहना है कि शरारती तत्वों ने पूर्वजों द्वारा बनाए गए शैड जलाकर उन्हें बड़ी मुसीबत में डाल दिया है।
पशुपालकों को आशंका है कि कवालिया चोटी पर घूमने आने वाले पर्यटकों या अन्य लोगों ने यह शरारत की होगी। उन्होंने बताया कि इस चोटी पर कवालिया देवता का प्राचीन मंदिर भी स्थित है, जिन्हें पशुपालकों का देवता माना जाता है। मान्यता है कि देवता की कृपा से इस क्षेत्र में बाघ या तेंदुए जैसे हिंसक जानवरों का भय नहीं रहता। यही नहीं, यहां बनाए जाने वाले अस्थाई शैडों में दरवाजे तक नहीं लगाए जाते, क्योंकि देवता की कृपा से चोरी का भी कोई डर नहीं होता।
गौरतलब है कि समूचे क्षेत्र के पशुपालक हर वर्ष अप्रैल-मई में अपनी भैंसों को लेकर कवालिया चोटी पर जाते हैं और अक्तूबर-नवंबर में अपने घर लौटते हैं। इस दौरान भैंसें और अन्य मवेशी खुले वातावरण में स्वच्छंद रूप से विचरण करते हैं। पशुपालक सुबह और शाम भैंसों से दूध निकालकर उन्हें खुले में चरने के लिए छोड़ देते हैं। यह प्रक्रिया करीब छह महीने तक चलती है।
जबर सिंह ठाकुर ने बताया कि हर वर्ष अक्तूबर माह में कवालिया देवता की जातर निकाली जाती है, जिसमें पूरे क्षेत्र के लोग शामिल होते हैं। इस अवसर पर देवता की पूजा के लिए भंडारे के रूप में भैंस के दूध से खीर बनाई जाती है। ऐसे में शैडों को जलाने की घटना से न केवल पशुपालकों की आजीविका प्रभावित हुई है, बल्कि क्षेत्र की आस्था और परंपरा को भी गहरा आघात पहुंचा है।



