सराहां : जिला सिरमौर के ऐतिहासिक वामन द्वादशी मेले की चमक-धमक के बीच इस बार सराहां में यात्रियों की सांसें फूल रही हैं। जिस बस अड्डे का निर्माण लोगों को सुगम सफर की सुविधा देने के लिए हुआ था, वहां इस वक्त मेले के बड़े-बड़े झूले झूल रहे हैं।
नतीजा यह कि रोज़मर्रा की आवाजाही करने वाले लोगों के साथ कामकाजी लोगों को बस पकड़ने के लिए सामान के बोझ के साथ 1 से 2 किलोमीटर तक पैदल भटकना पड़ रहा है।
सबसे ज्यादा बुजुर्गों, महिलाओं और छोटे बच्चों को दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं, जिन्हें सड़कों पर जहां तहां खड़ी बसों तक पहुंचने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही हैं।
न प्रबंधन, न बस स्टाफ खुश
स्थानीय लोगों का कहना है कि बस अड्डे की जगह का इस्तेमाल विशुद्ध रूप से कमर्शियल (व्यावसायिक) गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। सामान्य दिनों में जहां से बसें अपनी मंजिल के लिए रवाना होती थीं, वहां अब मेले की दुकानें और झूले सजे हैं।
अस्थायी तौर पर अलग-अलग जगहों से बसों का संचालन होने के कारण सिर्फ यात्री ही नहीं, बल्कि बस चालक और परिचालक भी खासे परेशान हैं। वहीं प्रबंधन भी खासा निराश है।
ये बड़ा सवाल
बस अड्डे की जमीन को मेले के लिए दिए जाने पर अब बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय सवाल खड़ा हो गया है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस व्यावसायिक इस्तेमाल के बदले हिमाचल पथ परिवहन निगम (HRTC) या संबंधित विभाग को कोई किराया नहीं मिला है।
अब बड़ा सवाल ये है कि अगर यह जमीन जन सुविधा (सार्वजनिक परिवहन) के लिए है, तो इसे कमर्शियल गतिविधियों के लिए किस आधार पर दिया गया? इसके लिए किसकी अनुमति ली गई और क्या शर्तें तय की गईं?
पिछले साल का विरोध भी दरकिनार
यह पहली बार नहीं है, जब ऐसा हुआ है। स्थानीय निवासियों के मुताबिक, पिछले साल भी मेले के दौरान बस अड्डे पर झूले लगाने का कड़ा विरोध हुआ था। यात्रियों की दुर्दशा को देखते हुए व्यवस्था बदलने की मांग की गई थी। इसके बावजूद प्रशासन ने पुरानी गलती से कोई सबक नहीं लिया और व्यवस्था फिर दोहरा दी गई।
लोगों का कहना है कि मेला साल में कुछ दिनों का उत्सव है, लेकिन बस अड्डा हमारी रोजमर्रा की जरूरत है। अगर मेले के लिए बस स्टैंड खाली ही कराना था, तो पहले यात्रियों के लिए कोई पुख्ता वैकल्पिक इंतज़ाम किया जाना चाहिए था।
विवादों में सराहां मेला
सराहां मेले की व्यवस्थाएं पहले से ही चर्चा और विवादों में रही हैं। जलेबियों का मामला सुर्खियां बटोर चुका है। अब बस अड्डे की जमीन झूलों को सौंपने के फैसले ने मेले के प्रबंधन पर फिर से गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मेले में इस बार प्लॉट इतने महंगे किए गए कि दुकानदारों ने इन्हें लेने से इनकार कर दिया और कई प्लाट खाली रह गए। इसका नतीजा ये निकला कि जिन दुकानदारों ने प्लॉट खरीदे हैं, उन्हें प्लॉट का मोल चुकाने के लिए सामान महंगा करना पड़ा। अब इसका सीधा असर कारोबार पर भी पड़ गया है।
