चंद्रकांत पाराशर
किन्नौर की बर्फीली वादियों में गूंजता एक प्राचीन लोकगीत… विलुप्ति की कगार पर खड़ी स्थानीय बोलियां… दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटी की खोज… और जीवन बचाने का संघर्ष। महज 30 मिनट की आंचलिक लघु फिल्म ‘तन्फ़ा’ इन सभी पहलुओं को इतनी संवेदनशीलता से पर्दे पर उतारती है कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि किन्नौर की सांस्कृतिक स्मृतियों और लोकज्ञान को बचाने का सशक्त दस्तावेज बन जाती है।
प्रख्यात कला समीक्षक चंद्रकांत पाराशर ने अपनी समीक्षा में लिखा है कि लंबे अंतराल के बाद ऐसी लघु फिल्म देखने को मिली, जो मनोरंजन से आगे बढ़कर समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने का काम करती है। फिल्म दर्शकों को न केवल भावनात्मक रूप से छूती है, बल्कि उन्हें अपनी लोकभाषाओं, लोकगीतों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर गंभीरता से सोचने के लिए भी प्रेरित करती है।
जीवन और लोकज्ञान के बीच पुल बनती है ‘तन्फ़ा’
‘तन्फ़ा’ का अर्थ है औषधीय पौधे के रूप में दिया या लिया जाने वाला उपहार। फिल्म की कहानी दाई मां डोलमा से शुरू होती है, जो कंदार गांव में दस वर्ष बाद जन्म लेने वाले पहले बच्चे के प्रसव में सहायता के लिए पहुंचती है। प्रसव के दौरान स्थिति गंभीर हो जाती है और आसपास कोई आधुनिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं होती।
ऐसे में मां की जान बचाने की आखिरी उम्मीद एक दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटी होती है, जिसकी पहचान केवल गांव की एक बुजुर्ग दादी को है। दाई मां, दादी और उसकी पोती उस जड़ी-बूटी की तलाश में निकल पड़ते हैं। उनके पास रास्ता दिखाने वाला कोई नक्शा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा एक लोकगीत ही उनका मार्गदर्शक बनता है।
जब भाषा भूलने लगी पीढ़ियां, कठिन हो गई विरासत की पहचान
फिल्म का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि जिस लोकगीत में जड़ी-बूटी तक पहुंचने का रहस्य छिपा है, उसकी भाषा नई पीढ़ी तो दूर, दाई मां भी पूरी तरह भूल चुकी है और उनकी पोती ने कभी सीखा ही नहीं। किन्नौर की विभिन्न स्थानीय बोलियों में रचा गया यह गीत समझना आसान नहीं होता।
इस लघु फिल्म के लोकगीत में बताया गया है कि पौराणिक काल में देवी जी और राक्षसों के बीच लड़ाई हुई थी, जिसमें देवी जी जख्मी हुई थी तो इलाज इस फूल के जड़ से हुआ था। हालांकि, दादी इस गाने को पूरी तरह से नहीं समझ पा रही थी (क्योंकि यह गीत किन्नौर-क्षेत्र की ही किसी और बोली में था, यहां कई बोलियां बोली जाती हैं) जिसकी वजह से वह चिकित्सकीय-फूल ढूंढना मुश्किल हो रहा था।
इत्ति ने इस गाने को ऑनलाइन ब्रॉडकास्ट करके इस गाने को समझने में दूसरे लोगों की मदद ली। गाने में आगे बताया गया है कि यह फूल किसी गुफा में है और देवी जी की हालत देख कर माउण्टेन स्पिरिट्स (साउने) देवी जी की मदद करती हैं।
अंत में दादी फूल को पहचान लेती हैं और पर्वतीय-जंगल से की पंजेनुमा जड़ लेकर वो लोग वापस आते हैं और दवाई बना कर प्रसूता को पिला देते हैं और वो ठीक हो जाती है। इस तरह प्रसूता की जान बच जाती है।
विलुप्त होती बोलियों के संरक्षण का संदेश
फिल्म किन्नौरी, शमसेहो, चितकुली (जांग्राम), सूनम और जंगशुंग (थेबोर) जैसी लिपिहीन और विलुप्त होती स्थानीय बोलियों की चिंता को बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। यह बताती है कि जब कोई भाषा समाप्त होती है तो उसके साथ सदियों का लोकज्ञान, लोकगीत, लोककथाएं और सांस्कृतिक स्मृतियां भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं।
कम बजट की फिम, लेकिन संदेश बेहद बड़ा
फिल्म की निर्देशिका निहारिका थुंग्ज़ नेगी के अनुसार ‘तन्फ़ा’ किसी निष्कर्ष पर पहुंचने वाली फिल्म नहीं, बल्कि संवाद शुरू करने का माध्यम है। इसका उद्देश्य बुजुर्गों, युवाओं और परिवारों को एक साथ लाकर किन्नौर की जीवंत सांस्कृतिक विरासत का उत्सव मनाना और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।
उन्होंने बताया कि फिल्म की पूरी कास्ट और क्रू किन्नौरी समुदाय से है, जिनमें अधिकांश कलाकारों ने पहली बार किसी फिल्म में अभिनय किया है।
राहुल सांकृत्यायन के दस्तावेज की याद दिलाती है फिल्म
समीक्षा में उल्लेख किया गया है कि छह-सात दशक पहले यायावर पंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘किन्नर देश में’ के माध्यम से किन्नौर की पारंपरिक चिकित्सा, दुर्लभ जड़ी-बूटियों और देवी-देवताओं से जुड़े लोकगीतों का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया था। ‘तन्फ़ा’ उसी लोकज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को नए समय में नए माध्यम से जीवंत करने का प्रयास करती है।
धीमी गति, लेकिन गहरा प्रभाव
फिल्म की गति भले ही धीमी हो, लेकिन किन्नौर की प्राकृतिक सुंदरता, स्थानीय वेशभूषा, बोलियों और कलाकारों का सहज अभिनय इसे बेहद प्रामाणिक बनाता है। किन्नौरी भाषा से अपरिचित दर्शकों के लिए अंग्रेज़ी सबटाइटल्स कहानी को समझने में मदद करते हैं।
सिर्फ फिल्म नहीं, आने वाली पीढ़ियों के नाम एक संदेश
‘तन्फ़ा’ यह एहसास कराती है कि यदि आज स्थानीय बोलियों, लोकगीतों और पारंपरिक ज्ञान को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक पहचान का एक अमूल्य हिस्सा हमेशा के लिए खो देंगी। यही वजह है कि यह लघु फिल्म केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने और सोचने के लिए बनी एक ऐसी रचना है, जो किन्नौर की मिटती आवाजों को नई पहचान देने का ईमानदार प्रयास करती है।