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ट्रंप को ईरान की दो टूक: दबाव नहीं सहेंगे, होर्मुज से जहाज अब हमारे नियमों पर गुजरेंगे

यह बयान ऐसे समय आया है जब युद्धविराम के बावजूद अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

ईरान ने अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को साफ संदेश देते हुए कहा है कि वह किसी भी तरह का दबाव स्वीकार नहीं करेगा। ईरान के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल रेजा तलाएई-निक ने सरकारी टीवी पर कहा कि अब अमेरिका उस स्थिति में नहीं है कि वह दूसरे देशों पर अपने फैसले थोप सके। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ट्रंप की गलत मांगों को ईरान कभी स्वीकार नहीं करेगा और अमेरिका को अपनी शर्तें छोड़नी ही होंगी।

यह बयान ऐसे समय आया है जब युद्धविराम के बावजूद अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। संघर्ष समाप्त करने के लिए जारी बातचीत में अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है। हालांकि, इस बीच ईरान ने पहली बार होर्मुज स्ट्रेट को खोलने की पेशकश की है। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका से समुद्री नाकेबंदी हटाने की अपील करते हुए प्रस्ताव दिया कि पहले युद्ध खत्म करने के व्यावहारिक कदम उठाए जाएं, जिनमें होर्मुज को खोलना शामिल है, जबकि परमाणु कार्यक्रम जैसे जटिल मुद्दों पर बाद में चर्चा हो।

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बताया गया कि 26 अप्रैल को ईरान ने यह प्रस्ताव अमेरिका को भेजा था, लेकिन ट्रंप ने इसे ठुकरा दिया। 27 अप्रैल को संशोधित रणनीति के तहत ईरान ने फिर प्रयास किया, लेकिन अमेरिका ने दोबारा इनकार कर दिया। पिछले कई सप्ताह से पाकिस्तान के जरिए दोनों देशों के बीच प्रस्तावों का आदान-प्रदान जारी है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम पर सहमति नहीं बन सकी है। अमेरिका चाहता है कि ईरान 20 वर्षों तक अपना परमाणु कार्यक्रम रोक दे और अपने पास मौजूद 440 किलो समृद्ध यूरेनियम सौंप दे।

ईरान ने साथ ही साफ किया है कि युद्ध समाप्त होने के बाद होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही पूरी तरह उसके निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल और नियमों के तहत होगी। शंघाई सहयोग संगठन की रक्षा मंत्रियों की बैठक में तलाएई-निक ने कहा कि व्यापारिक जहाजों की सामान्य आवाजाही बहाल की जाएगी, लेकिन हर जहाज को ईरान के सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा।

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दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का यह रुख वैश्विक बाजार के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है। इसे युद्ध के बाद क्षेत्रीय नियंत्रण बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

Aapki Baat News Desk
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